जापान में फुकुशिमा के तीन रिएक्टरों में विस्फोटों ने एकबार फिर परमाणु ऊर्जा के विनाशकारी पक्ष को सामने ला खड़ा किया और अब उबरते हुए परमाणु उद्योग का वैश्विक आकर्षण खत्म होता नजर आ रहा है। यूरोप जर्मनी जैसे विकसित देश इससे किनारा करते नजर आ रहे हैं। फुकुशिमा ने भारत द्वारा परमाणु रिएक्टरों के आयात के सौदों और इस काम के लिए हो रहे  जबरन भूमि अधिग्रहण पर बहस को फिर से जिंदा कर दिया है। भोपाल गैस त्रासदी पर सरकार के लाचार रवैये को देखते हुए फुकुशिमा एक चेतावनी बनकर सामने आया है। मुश्किल की इस घड़ी में हम जापान के लोगों के साथ हैं और उम्‍मीद करते हैं कि वहां जल्‍द ही स्थितियों में सुधार आयेगा।

Fukushima reatorसमुद्र तट पर स्थापित परमाणु रिएक्टर के खतरों को 2004 में हिंद महासागर में आई सुनामी से पहले ही जाहिर हो गया था। तब भारत के दूसरे सबसे बड़े परमाणु रिएक्टर मद्रास एटॉमिक पावर स्टेशन के रिएक्टर बंद करने पड़े थे। सुनामी के वक्त इस संयत्र का एक रिएक्टर पहले ही बंद था। दूसरे रिएक्टर को इसलिए सुरक्षित तरीके से बंद किया जा सका था, क्योंकि विद्युत संयंत्र को रिएक्टरों से ऊंचे स्थान पर स्थापित किया गया था। अब फुकुशिमा हादसे ने फ्रांस की एरेवा कंपनी द्वारा जैतापुर में 60 हजार करो़ड लागत वाले 9900 मेगावाट परमाणु ऊर्जा संयत्र की सुरक्षा को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। इसमें छह ऐसे रिएक्टर लगाए जाएंगे, जिनके डिजाइन का अब तक परीक्षण ही नहीं हुआ है।

वहीं दूसरी तरफ जैतापुर भूकंप के लिए अतिसंवेदनशील क्षेत्र में निहित है। पिछले बीस वर्षों में इस गांव ने 92 भूकंप देखे हैं। सबसे हाल का भूकंप मात्र दो वर्ष पहले ही आया था। यह शर्म की बात है कि फिर भी सरकारी अफसरशाही इस खतरे पर पर्दा डालते हुए यह दावा कर रहे हैं कि परमाणु रिएक्टर के लिए साइट पर एक तीसरे दर्जे के भूकंप क्षेत्र में निहित है।परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. अनिल काकोडकर द्वारा महाराष्ट्र सरकार को राहत पहुंचाने वाला यह बयान  कि “प्रस्तावित जैतापुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र को सुनामी का कोई खतरा नहीं है, क्योंकि जिस स्थान पर यह परियोजना लगाई जा रही है, वह समुद्र स्तर से ऊपर एक पठार पर है,” भी आशंकाओं से घिरी जैतापुर परियोजना पर से संदेह के बादल नहीं हटा पा रहा है। स्थायित्व एवं प्रतिष्ठा संबंधित जोखिम का हवाला देते इसमें निवेश से दो जर्मन बैंकों ने भी हाथ पीछे खींच लिऐ हैं।

वहीं दूसरी तरफ खुद कंपनी का अपने परमाणु संदूषण का बुरा ट्रैक रिकॉर्ड है। इसके चलते फ्रांसीसी परमाणु निगम अरेवा रिएक्टरों की विश्‍व प्रतिष्‍ठा अच्‍छी नहीं है। यूरोप में हुए एक स्वतंत्र मूल्यांकन में इन्‍हें खारिज किया जा चुका है। इस सच  के बावजूद पिछले लगभग एक वर्ष से जैतापुर गांव के लोगों द्वारा सरकारी परमाणु रिएक्टर बनाने की योजना का विरोध और उनके विरोध के स्‍वरों का सरकारी अधिकारियों द्वारा दमन का सिलसिला जारी है।