बिहार, यूपी के ग्रामीण प्रतिनिधिमंडल ने योजना आयोग के समक्ष रखीं आरजीजीवीवाई पर अपनी मांगें और सुझाव

ग्रीनपीस व अन्य सहयोगियों ने की ग्रामीण विद्युतीकरण में डीआरई को वरीयता देने की मांग

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Press release - September 2, 2011
पटना (बिहार)/लखनऊ (उत्तर प्रदेश), 2सितम्बर, 2011: बिहार के मधुबनी व सारण ज़िले और उत्तर प्रदेश में आज़मगढ़ ज़िले के ग्रामीणों का एक प्रतिनिधिमंडल आज ग्रीनपीस कार्यकर्ताओं के साथ योजना आयोग के सदस्यों से मिला और सरकार की महत्वाकांक्षी स्कीम राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना (आरजीजीवीवाई) में विकेन्द्रीकृत अक्षय ऊर्जा यानी डिसेन्ट्रलाइज्ड रिन्यूवेबिल इनर्जी (डीआरई) की भागीदारी बढ़ाने की मांग की ताकि इस योजना को और प्रभावी व असरदार बनाया जा सके। इस प्रतिनिधिमंडल ने योजना आयोग के सदस्यों को आरजीजीवीवाई के सोशल आडिट के बाद उभर कर आई अपनी प्रमुख सिफारिशें भी सौंपी।

ग्रीनपीस और उसके सहयोगी संगठनों ने कुछ माह पूर्व बिहार में मधुबनी व सारण, उत्तर प्रदेश में आज़मगढ़ व आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम ज़िलों के 31 गांवों में आरजीजीवीवाई की ज़मीनी हकीकत से रूबरू होने के लिए सोशल आडिट किया और जन सुनवाई कार्यक्रम आयोजित किये थे। सोशल आडिट ने केन्द्र सरकार के दावों की यहां पोल खोल दी। उसके दावों और ज़मीनी हकीकत में यहां कोई तालमेल देखने को नहीं मिला बल्कि दोनों के बीच भारी फर्क दिखाई दिया।

योजना आयोग के दल ने ध्यानपूर्वक प्रतिनिधिमंडल की सिफारिशें सुनीं तथा आश्वासन दिया कि 12वीं पंच वर्षीय योजना के अंतर्गत आरजीजीवीवाई में इनको शामिल करने पर विचार किया जयेगा।

बिहार के सारण ज़िले के मकेर ब्लाक के भाथा ग्राम पंचायत के मुखिया राकेश कुमार ने कहा, “आरजीजीवीवाई स्कीम ने हमें प्रतिदिन 6-8 घंटे बिजली देने का वादा किया था लेकिन अभी तक हमें बिजली का कनेक्शन तक नहीं मिल पाया है। हमारे गांव के ज्यादातर लोगों को यही पता नहीं है कि इस योजना से उनको क्या लाभ होगा। उनकी इस जागरूकता की कमी के कारण योजना में भ्रष्टाचार व्याप्त है। हमें उम्मीद है कि योजना आयोग इस ज़मीनी हकीकत पर गौर करेगा और हमारी समस्याओं पर ध्यान देगा। साथ ही इस योजना को प्रभावी बनाने के लिए जरूरी बदलाव करेगा”।

गौरतलब है कि आरजीजीवीवाई वेबसाइट बिहार के सारण और मधुबनी ज़िलों में क्रमश: सौ फीसदी व 97 फीसदी विद्युतीकरण हो जाने का दावा करती है जबकि जमीनी हकीकत यह है कि सारण जिले की 78 फीसदी आबादी और मधुबनी जिले के ज्यादातर गांवों में अभी तक बिजली पहुंची ही नहीं है। इसी तरह आरजीजीवीवाई वेबसाइट उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ ज़िले में 93 फीसदी विद्युतीकरण होने का दावा करती है जबकि हकीकत में ज्यादातर लोगों को यहां बिजली कनेक्शन ही नहीं दिया गया है।

आंध्र प्रदेश में जहां गांवों में पहले से ही कुछ बिजली पहुंच चुकी थी, आरजीजीवीवाई यहां विद्युतीकरण की रफ्तार बढ़ाने में नाकाम साबित हुई है। बिजली क्षेत्र में हुए ढांचागत सुधार के बावजूद बिजली की आपूर्ति यहां सुधर नहीं पायी है। यह योजना लोगों की उस बिजली मांग को पूरा नहीं कर पायी है जिसकी मदद से वे रोशनी हासिल करने के अलावा कुछ दूसरे कामकाज भी कर सकें।

बिहार और उत्तर प्रदेश में तमाम ऐसे इलाके हैं जहां विकेन्द्रीकृत अक्षय ऊर्जा (डीआरई) ने लोगों को उम्मीद की किरण दिखाई है। अगर आरजीजीवीवीई के तहत इस डीआरई व्यवस्था को शामिल कर दिया जाये तो लोगों को पर्याप्त बिजली मिल सकती है और ग्रामीण भारत को सही मायने में ऊर्जावान बनाया जा सकता है।

ग्रीनपीस इंडिया की अभियानकर्ता अर्पणा उडुपा ने बताया, “डीआरई में उन ग्रामीण इलाकों तक बिजली पहुंचाने की क्षमता है जिनको अभी तक ग्रिड से नहीं जोड़ा जा सका है। साथ ही जो गांव ग्रिड से जुड़ चुके हैं, डीआरई में वहां की बिजली आपूर्ति  और सुधारने की क्षमता है। आरजीजीवीवाई में डीआरई के लिए प्रावधान तो है लेकिन उसका अब तक सही इस्तेमाल नहीं किया गया है। इस योजना में आमूल-चूल परिवर्तन की जरूरत है ताकि उसे स्थानीय जरूरतों के अनुकूल बनाया जा सके और लोगों को नियमित रूप से भरोसेमंद ऊर्जा मुहैया करायी जा सके। डीआरई इस खाई को पाटने का काम कर सकता है। उन्होंने कहा कि हालात देखते हुए योजना आयोग को 12वीं पंच वर्षीय योजना में आरजीजीवीवाई में डीआरई को प्राथमिकता देना चाहिए””। यह प्रतिनिधिमंडल अपनी मांगों को आगे बढ़ाने के लिए अब ऊर्जा मंत्रालय और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद से भी मुलाकात करेगा।

ग्रीनपीस ने योजना आयोग से आरजीजीवीवाई में शामिल डीआरई को मुख्य धारा में लाने का आग्रह किया और कहा:

  • आरजीजीवीवाई के कार्य क्षेत्र में डीआरई उत्पादन इकाईयों (आफ ग्रिड और आन ग्रिड) को तेजी से स्थापित कराया जाये। इसके लिए 25 फीसदी संसाधन मुहैया कराने का लक्ष्य भी तय किया जाये।
  • लक्ष्य में शामिल किये गये गांवों के सौ फीसदी घरों में बिजली पहुंचाई  जाये।
  • जबावदेही बढ़ाने के लिए योजना में सोशल आडिट के तत्वों को समाहित किया जाये।
  • ग्रामीण ऊर्जा कार्यक्रम के हिस्से के रूप में सिंचाई और मध्यम व कुटीर उद्योगों के लिए ऊर्जा ढांचा बनाया जाये, उसके लिए दिशा-निर्देश तय किये जायें।
  • योजना के बेहतर क्रियान्वयन व निगरानी के लिए पंचायती राज संस्थाओं को शामिल किया जाये।

 

अधिक जानकारी के लिए कृपया संपर्क करें:

  • मुन्ना झा, मीडिया सलाहकार, ग्रीनपीस इंडिया, 09570099300,
  • अर्पणा उडुपा , अभियानकर्ता, ग्रीनपीस इंडिया, 0953515200,
  • शचि चतुर्वेदी, मीडिया अधिकारी, ग्रीनपीस इंडिया, 9818750007,