आरजीजीवीवाई से मधुबनी निराश; सुनिश्चित और गुणवत्ताइपूर्ण ऊर्जा उपलब्ध कराने से योजना कोसों दूर: ग्रीनपीस सामाजिक परिक्षण

जन सुनवाई में लोगों ने की विकेन्द्रित अक्षय ऊर्जा को शामिल करने की मांग

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Press release - May 5, 2011
कपसिया गांव, मधुबनी, 5 मई 2011: राजीव गाँधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना (आरजीजीवीवाई) मधुबनी के लोगों की बिजली जैसी महत्वनपूर्ण आवश्य कता को पूरा करने में नाकाम रही है। इसके साथ ही मधुबनी के गांवों की किसी भी तरह के विकास की उम्मीईदें एक बार फिर धूमिल हो गई हैं। ये वे निराशाजनक तथ्यग हैं जो मधुबनी जिले के कपसिया गांव में जन सुनवाई के दौरान आज जारी की गई ग्रीनपीस की समाजिक प���िक्षण रिपोर्ट में सामने आए हैं।

यह जन सुनवाई ग्रीनपीस ने सखी संस्था तथा कपसिया के लोगों के साथ मिल कर आयोजित की है। इस आयोजन में लोगों को स्‍थानीय नेताओं, नीति निर्धारकों तथा सम्‍बन्धित विभागों के अधिकारियों के सामने अपने गाँव और ज़िले में बिजली आपूर्ति की स्थिति के बारे में अपने विचार और शिकायतें रखने का मौका मिलेगा।

ग्रीनपीस ने अपनी सहयोगी संस्‍था सखी की मदद से मधुबनी के छह विकास खण्‍डों – बेनीपट्टी, बाबूबरही, बिसफी, लौकाही, माधेपुर और हरलाखी में एक महीने के दौरान सामाजिक परिक्षण किया था।

रिपोर्ट में आरजीजीवीवाई में व्‍याप्‍त अनेक विसंगतियों का उल्लेख किया गया है। साथ ही इस योजना को लेकर किये जा रहे दावों और ऑडिट टीम द्वारा पाई गई जमीनी हकीकत में बहुत अंतर है। उदाहरण के तौर पर आरजीजीवीवाई की वेबसाइट पर यह दावा किया गया है कि मधुबनी में विद्युतीकरण का काम 97 प्रतिशत तक पूरा कर लिया गया है। बहरहाल, ग्रीनपीस के सर्वेक्षण में पाया गया है कि लगभग सभी गांवों में पूरे एक दिन भी बिजली मुश्किल से ही मिलती है। करीब आधे लोगों को एक दिन में करीब एक घंटे तक ही बिजली मिल पाती है और वह भी महीने में 10 से भी कम दिनों में। 24 प्रतिशत लोगों को जरा सी भी बिजली नहीं मिल पाती है।

ग्रीनपीस इंडिया की अभियानकर्ता और मधुबनी ज़िले में हुए आरजीजीवीवाई के सामाजिक परिक्षण की प्रभारी अर्पणा उडुपा ने कहा, “ऐसा लगता है कि गाँवों को बिजली उपलब्‍ध कराने के मामले में सरकार ने सिर्फ औपचारिकताएं पूरी की हैं। दरअसल ज्‍यादातर वक्‍त तक बिजली आती ही नहीं है जिसकी वजह से विद्युत कनेक्‍शन पूरी तरह अनुपयोगी साबित हो रहे हैं। 92 प्रतिशत लोग आरजीजीवीवाई के बारे में जानते ही नहीं हैं, नतीजतन इस योजना में भ्रष्‍टाचार ने संध बना ली है। इस योजना के केन्‍द्रीयकृत ढांचे और क्रियान्‍वयन ने इस योजना पर अमल में शामिल विभिन्‍न सरकारी एजेंसियों की असलियत सामने ला दी है। इसकी वजह से स्‍थानीय प्रशासन के मध्‍य इस योजना के प्रति उदासीनता पैदा हुई है।”

जितनी भी बिजली मधुबनी के गावों को मिलती है उसकी गुणवत्ता निराशाजनक है। 95 प्रतिशत लोगों ने बिजली के कम वोल्‍टेज और अनियमित आपूर्ति की शिकायत की। अनेक गांवों में आधी रात के बाद बिजली आती है और उस वक्‍त उसकी कोई उपयोगिता नहीं रह जाती।

सखी की सचिव सुमन सिंह ने कहा “ऐसा लगता है कि चाहे केन्‍द्र सरकार हो या बिहार सरकार, या कोइ क्रियान्‍वयन एजेंसी, किसी को भी इस बात की चिंता नहीं है कि ट्रांसफॉर्मर ठीक हैं या नहीं, बिजली की आपूर्ति हो रही है या नहीं। इसका परिणाम यह है कि तार चोरी और ट्रांसफार्मर जलने के अनेक मामले सामने आ रहे हैं। यहां तक कि लोगों को अपनी जेब से खर्च कर ट्रांसफार्मरों की मरम्‍मत करानी पड़ रही है। गोपालपुर में हमने ऐसा ही मामला पाया। 95 प्रतिशत लोगों को यह नहीं मालूम है कि बिजली नहीं मिलने पर वे किससे शिकायत करें। इस बीच, राज्‍य और केन्‍द्र की सरकारें एक-दूसरे को दोष देने में व्‍यस्‍त हैं और लोग अंधेरे में रहने को मजबूर हैं।”

बिजली न मिलने से त्रस्त, मधुबनी जिले के देओरा गाँव के शिवनारायण यादव ने कहा “जब‍ बिजली ही नहीं है तो कनेक्‍शन का क्‍या लाभ। मेरा नाम गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) जीवन-यापन करने वाले लोगों की सूची में शामिल है लेकिन मुझे बिजली का कनेक्‍शन सिर्फ इसलिये नहीं मिला क्‍योंकि मैं ठेकेदार को इसके लिये धन नहीं दे सका। अब बहुत इंतजार हो गया। अर्से तक अंधेरे में रहने के बाद अब हम बिजली चाहते हैं ताकि हम अपनी जिंदगी को बेहतर बना सकें।”

अर्पणा उडुपा ने इस योजना से जुड़े मूलभूत मुद्दों के बारे में विस्‍तार से बताते हुए कहा “गलत रवैये और अनियमित, अनिश्चित तथा बेतुके वक्‍त पर आपूर्ति ने इस योजना पर बड़ा सवाल खड़ा किया है। इस योजना में ग्रामीण भारत को वास्‍तव में विद्युतीकृत और विकसित करने की क्षमता है। लेकिन इस ढांचे और त्रुटिपूर्ण क्रियान्‍वयन ने इस योजना को उसके उद्देश्‍यों से दूर कर दिया है। परिक्षण के नतीजों से बिल्‍कुल स्‍पष्‍ट हो गया है कि स्‍थानीय जरूरतों को पूरा करने के लिये आरजीजीवीवाई में व्‍यापक बदलाव की जरूरत है। विक्रेन्द्रित अक्षय ऊर्जा बिजली की मांग और आपूर्ति के अंतर को भर सकती है।”

ग्रीनपीस यह सिफारिश करता है कि निम्‍नलिखित बातों को शामिल कर तैयार किया जाने वाला वैकल्पिक रास्‍ता ही बिहार को ऊर्जीकृत बना सकता है:

  • गुणवत्‍तापूर्ण बिजली उत्‍पादन और स्‍थानीय स्‍तर पर आपूर्ति सुनिश्चित कराने के लिये लघु अक्षय ऊर्जा उत्‍पादन इकाइयां लगाई जाएं।
  • गांवों के विकास के लिये योजना में सिंचाई तथा मध्‍यम एवं लघु उद्योगों को शामिल किया जाए तथा स्‍थानीय एजेंसियों की भागीदारी सुनिश्चित कराई जाए।

ग्रीनपीस इस सामाजिक परिक्षण की रिपोर्ट को केन्‍द्र तथा राज्‍य सरकार को भेजेगा। राज्‍य में बिजली आपूर्ति की खराब स्थिति को लेकर हो रहे हिंसक प्रदर्शनों के बीच हम चाहते हैं कि मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार इस सामाजिक परिक्षण रिपोर्ट पर विचार करने के लिये योजना आयोग तथा केन्‍द्र सरकार से सम्‍पर्क करें। साथ ही उन्‍हें आरजीजीवीवाई को 13वीं पंचवर्षीय योजना की अवधि तक बढ़ाने से पहले इसमें विकेन्द्रित अक्षय ऊर्जा उत्‍पादन को शामिल करने की बात भी रखनी चाहिये।

 

अधिक जानकारी के लिये कृपया सम्‍पर्क करें:  

  • अर्पणा उडुपा, कैम्‍पेनर, ग्रीनपीस इंडिया, 0953515200,
  • शचि चतुर्वेदी, वरिष्‍ठ मीडिया अधिकारी, ग्रीनपीस इंडिया, 09818750007, [email protected] greenpeace.org
  • मुन्‍ना झा, मीडिया सलाहकार, ग्रीनपीस इंडिया, 09570099300,
  • सुमन सिंह, सचिव, सखी, 09431021204 

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