34,000 लोगों ने की “नो गो ” मुद्दे पर प्रणव मुखर्जी से खुली बहस कराने की मांग

ज्वलंत वन संबंधी मुद्दों पर जनता के निर्णय को दें वरीयता: पर्यावरणविद

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Press release - February 17, 2011
नई दिल्ली, 17 फरवरी, 2011 : देश के 34,000 लोगों ने केन्द्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी से मांग की है कि वे किसी फैसले पर पहुंचने से पहले ‘नो गो फारेस्ट’ (अक्षुण्णं वनक्षेत्र) बनाम कोयला खनन मुद्दे पर सार्वजनिक बहस करायें। इस बहस में वे पर्यावरणविदों व स्थानीय लोगों को शामिल करें। प्रणव मुखर्जी केन्द्रीय मंत्रि मंडल द्वारा बनाये मंत्रियों के उस समूह के अध्यक्ष हैं जो इस संवेदनशील मुद्दे पर निर्णय लेने वाला है। चयनित मंत��रियों के इस समूह की पहली बैठक आज होनी तय है।

ग्रीनपीस के एक प्रतिनिधिमंडल ने आज वित्त मंत्री को इस संबंध में एक याचिका सौंपी और कहा कि यह मुद्दा बेहद संवेदनशील है जो 12 लाख एकड़ घने जंगल के भविष्य को तय करेगा। इसलिए राष्ट्र हित से जुडे़ इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर कुछ मंत्रियों को बंद कमरे में बैठकर कोई फैसला नहीं लेना चाहिए। 

ग्रीनपीस की जलवायु एवं ऊर्जा कैम्पेनर प्रीति हरमन ने आज यहां कहा, “हमारे घने जंगलों में खनन का मुद्दा न केवल बेहद संवेदनशील है बल्कि राष्ट्र हित से जुडा़ हुआ है। इसे कुछ लोगों द्वारा वंद कमरे में गुपचुप तरीके से तय नहीं किया जाना चाहिए। ये वन क्षेत्र महत्वपूर्ण जल विभाजक हैं। जंगलों के आसपास रहने वाले हजारों आदिवासियों के लिए जीवनयापन के संसाधन हैं और महत्वपूर्ण जैव विविधता के आश्रय स्थल हैं। खनन से यदि ये एक बार नष्ट हो गये तो फिर उनकी भरपाई कभी नहीं हो पायेगी। हम वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी से मांग करते हैं कि वे इस क्षेत्र से जुडे़ सभी संबंधित पक्षों और विशेषज्ञों के साथ उचित विचार-विमर्श करने की प्रक्रिया अपनाये बिना कोई फैसला न करें।

इस्पात, कोयला व खनन मंत्रालयों और योजना आयोग की तरफ से पड़ रहे कई तरह के दबावों के आगे झुकते हुए पर्यावरण एवं वन मंत्रालय पहले की प्रस्तावित “नो गो जोन” पर शिथिल पड़ चुका है। इस क्षेत्र को 320,684 हेक्टेयर से घटाकर 140,311 हेक्टेयर कर चुका हैं। उसके 1,80,373 हेक्टेयर घने वनक्षेत्र को खनन के लिए खोल दिया है।

जानी-मानी वन अधिकार कार्यकर्ता मधु सरीन ने कहा, कोयला खनन के कारण इस तरह का पर्यावरणीय और सामाजिक विध्वंस और विस्थापन देश के कई हिस्सों मे चल रहा है। भारत के जंगल उन समुदायों के लिए जीवन देने वाले संसाधन हैं जो अपनी अजीविका के लिए जंगलों पर निर्भर हैं। ऐसी स्थिति में सरकार के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह ऐसे लोगों को भी इस निर्णायक प्रक्रिया में शामिल करे। इस तरह का विचार-विमर्श कांग्रेस पार्टी के उस वायदे के अनुरूप भी होगा जो उसने जनजातीय लोगों और आर्थिक रूप से कमजोर वन समुदायों से किये थे।”

वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी आफ इंडिया की बिलिंडा राइट ने कहा, “इनमें से कई वन क्षेत्र या तो स्थाई रूप से वन्यजीवों के आवास हैं या फिर तेंदुआ, बाघ व हाथियों जैसे तमाम वन्यजीवों के महत्वपूर्ण कारीडोर (गलियारे) हैं। खनन के चलते पहले से ही देश के कई महत्वपूर्ण वन्यजीव कारीडोर नष्ट हो चुके हैं। जो वन्यजीवन अब बचा है, उसे संजोये रखने के लिए हमें बचे-खुचे जंगलों को खनन के लिए ‘नो गो जोन’ घोषित करना होगा। सरकार को चाहिए कि वह कोई भी फैसला लेने से पहले विशेषज्ञों से उचित विचार-विमर्श करे।”  वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी आफ इंडिया (डब्ल्यूपीएसआई) पर्यावरण से जुडे़ और मानव अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले उन 27 संगठनों में से एक है जिसने दिसम्बर, 2010 में जंगलों को कोयला खनन से मुक्त रखने के विचार को समर्थन देते हुए केन्द्रीय मंत्रिमंडल को पत्र लिखा था।

ग्रीनपीस की प्रीति हरमन ने आगे कहा, “ नो गो जोन पर बहस सरकार और अन्य राजनैतिक वर्गों को वह अवसर प्रदान करेगी जिसमें वे एक मेज़ पर बैठकर वर्तमान और भविष्य के लिए टिकाऊ ऊर्जा तंत्र निर्मित करने जैसे जमीनी मुद्दे पर बातचीत कर सकेंगे। कोयले पर आधारित योजनाओं को शामिल कर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के बजाय अब केन्द्रीयकृत और विकेन्द्रीयकृत ऊर्जा उत्पादन के माडलों को अपनाना चाहिए। हमारे अक्षय ऊर्जा स्रोतों में इतनी क्षमता है कि वे भारत को पूरी ऊर्जा सुरक्षा मुहैया करा सकते हैं।”

प्रसिद्ध वन अधिकार कार्यकर्ता मधु सरीन ने आगे कहा,  "अधिकांश जंगल क्षेत्र वन समुदायों के प्राचीन आवास हैं और वे संविधान की पांचवीं अनुसूची, पीईएसए और वन अधिकार अधिनियम से संचालित होते हैं। इन इलाकों में खनन के लिए वहां रहने वाले लोगों का और ग्राम सभाओं का समर्थन हासिल करना जरूरी है चाहे वे वहां से जाने वाले हों या न हों। मंत्रियों का समूह ने जिस आश्चर्यजनक तरीके से अनुसूचित जनजाति कमिश्‍नर और जनजाति मामलों के मंत्री को बाहर का रास्ता दिखा दिया है, दिल्ली के बंद कमरों में बैठकर कोयला खनन के लिए वनक्षेत्र को खोलने का फैसला नहीं कर सकते। यदि वरिष्ठ मंत्री आर्थिक विकास की रफ्तार को तेज करने के लिए नियमों के उल्लंघन का समर्थन करते हैं तो यह हमारे लोकतंत्र के मुंह पर एक तमाचा होगा। "

अधिक जानकारी के लिए कृपया संपर्क करें:

  • शचि चतुर्वेदी, सीनियर मीडिया आफिसर, ग्रीनपीस इंडिया

+91 9818750007,

  • प्रीति हरमन, कैम्पेनर-क्लाइमेट एंड इनर्जी, ग्रीनपीस इंडिया

+91 9901488482,

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