आमीन खान उम्र के पांचवे दशक में पहुंच चुके हैं। 1960 में रिहन्द बांध से विस्थापित एक परिवार की अगली पीढ़ी के मुखिया। मजदूरी करके अपने परिवार का पेट पालने वाले आमीन खान अब हर रोज मजदूरी करने भी नहीं जा पा रहे हैं। वजह है उनके उपर मंडरा रहा विस्थापन का खतरा। एक बार फिर से विस्थापन का डर। दो बार विस्थापन झेल चुके परिवार के मुखिया आमीन खान का ज्यादातर समय जिला कलेक्टर और थाने के चक्कर काटने में बीत रहा है।

आमीन खान की कहानी शुरू होती है सन् 1960 से। जब देश नेहरुवियन समाजवाद के नाम पर विकास का सफर शुरू कर रहा था। सिंगरौली-सोनभद्र इलाके में भी इस विकास की नींव डाली गयी- रिहन्द बांध के नाम पर। लोग बताते हैं कि तब नेहरु ने यहां के स्थानीय लोगों से अपील की थी कि वे देश के विकास के लिए अपनी जमीन और घर दें। बदले में इस पूरे इलाके को स्वीजरलैंड की तरह बनाया जाएगा। स्थानीय लोगों ने तो अपनी जमीनें देकर देशभक्ति का नमूना पेश कर दिया लेकिन बदले में इस जगह को नेहरु स्वीजरलैंड बनाना भूल गए। बाद में चलकर परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी कि लोगों के सपने में भी गलती से स्वीजरलैंड आना बंद हो गया।

03 जून 2014 Ash Pond

एश पांड की तस्वीर।

तो 1960 में अपनी ज़मीन को देश के विकास के लिए सौंपने वालों में मोहब्बत खान भी थे। आमीन खान के अब्बू। अपनी खेती की ज़मीन और घर छोड़कर पूरा परिवार दूसरे गांव वालों के साथ शाहपुर गांव पहुंच चला गया। यहां भी किसी तरह मजदूरी-किसानी करके लोगों की रोज़ी-रोटी चलती रही। रिहन्द बांध का कुछ हिस्सा जब पानी से ऊपर आता तो वहां खेती भी हो जाती।

उस जमाने में इस इलाके में जंगल भी खूब थे। आमीन बताते हैं कि, “महुआ, तेंदू, लकड़ी,  किसानी, गेंहू, धान, चना, मसूर उपजाते, भेड़-बकरी चराते थे और घर का पेट पलता था”। लेकिन नब्बे के दशक में सिंगरौली में विन्ध्याचल सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट (NTPC) विन्ध्यनगर ने दस्तक दी। पावर प्लांट आया तो उसके एश पांड (राख) के लिए शाहपुर को चुना गया और नतीजतन आमीन खान का परिवार एक बार फिर विस्थापित होने को मजबूर हुआ।

1999 का साल था। विस्थापित आमीन खान को न अपने कुंए का मुआवजा मिला और न ही पेड़ों का। घर का मुआवजा मिला तो सिर्फ 7,153 रुपये। जब भी लोगों ने अपना हक मांगा तो नियमों का हवाला देकर उन्हें चुप करा दिया गया। आमीन बताते हैं, “जब लोगों ने अपने घर नहीं छोड़ने देने की ज़िद की तो पुलिस-प्रशासन ने हम लोगों को डरा-धमका कर घर खाली करवा दिया”।

इतिहास फिर से लौटा, विस्थापन का डर भी

कहतें हैं इतिहास खुद को दोहराता है लेकिन इसके साथ विस्थापन का डर भी दोहराए तो सोचिए क्या हो। शाहपुर से विस्थापित होकर आमीन खान बलियरी में आकर बस गए। बलियरी वो गांव है जहां फिर से एनटीपीसी ने एश पॉण्ड बनाने का काम शुरू किया है। मतलब एक बार फिर से आमीन खान जैसे लोगों के लिए विस्थापन का खतरा। फिर से पुलिस ने डराने का काम शुरू कर दिया है। फिर से वही नियमों का हवाला देकर तहसीलदार सिंगरौली ने आमीन खान को नोटिस भेजा है- मध्यप्रदेश भू. राजस्व संहिता 1959 की धारा 248 के तहत घर खाली करवाने की धमकी और साथ में दरोगा को मामले पर कानूनी कार्रवाई करने का फरमान।

कई बार ऐसा होता है जब आमीन खान को दरोगा साहब पूरे परिवार के साथ थाने में बुलाते हैं और दिन भर बैठा कर फिर उन्हें वापस भेज दिया जाता है। आमीन बेहद निराश हैं। कहते हैं ‘कई बार खुद एनटीपीसी के अधिकारी बीआर डांगे ने धमकी दी है। जेल में डाल देंगे नहीं तो घर पर बुलडोजर चलवा देंगे’।

मुआवज़े की हेराफेरी

03 जून 2014 Essar Power plant

सिंगरौली स्थित एस्सार का पावर प्लांट।

सिंगरौली में कई सारे पावर प्लांट और कोयला खदान खुलने के बाद सिर्फ विनाश ही नहीं हुआ, विकास भी हुआ है। स्थानीय लोगों का विनाश, बाहरी जमीन और कोयला माफियाओं का विकास। बड़े-बड़े अधिकारी और पहुंच वाले लोग विस्थापन के लिए प्रस्तावित जमीन को खरीदते हैं और फिर उसे मोटी रकम में कंपनी को बेच देते हैं और असल विस्थापित दर-ब-दर भटकने को मजबूर हो जाते हैं। यहां भी वही हुआ है। आमीन आरोप लगाते हैं, ‘कई सारे एनटीपीसी के अधिकारियों ने पहले से ही ज़मीन की रजिस्ट्री अपने नाम करवा ली है और मुआवजा पा रहे हैं। कई सारे ऐसे लोगों का नाम भी विस्थापितों में है जो 200 किलोमीटर दूर रीवा जिले के रहने वाले हैं’।

खदानों और पावर प्लांटो के साथ मुफ्त आती हैं रहस्यमय बीमारियां

सिंगरौली के पावर प्लांट ने भले देश के शहरों को रौशन किया है लेकिन यहां के लोगों के जीवन में सिर्फ अंधेरा और रहस्यमयी बीमारियों के सिवा और कुछ नहीं आया। यह बात सौ फीसदी सच है कि जहां-जहां खदानें और पावर प्लांट लगाए गए वह इलाके कई रहस्यमयी बीमारियों का गढ़ बन गए। कहा जा सकता है कि खदानों और पावर प्लांटो के साथ बीमारियां मुफ्त आती हैं।

आमीन के 5 लड़के और 2 लड़कियां हैं। वे कहते हैं, ‘पता नहीं क्यों पिछले कई सालों से तीन बच्चों को पेट में दर्द रहता है और तेज़ बुखार आता है। डॉक्टर भी बीमारी का पता नहीं लगा पाते। शाहपुर में एनटीपीसी ने एक अस्पताल खोला था वो भी बंद कर दिया गया’।

सरकार और कंपनियों की देन अपने जीवन की तमाम तकलीफें झेलते हुए फिलहाल आमीन खान बच्चियों की शादी को लेकर चिंतित हैं। मगर चिंता सिर्फ एक नहीं है उन्हें एक अदद छत की भी फिक्र है और इन सबसे ज्यादा फिक्र है भूख की, सिर पर मंडराते एक और विस्थापन के खतरे की और अपने भविष्य की भी।