हमारी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना

सभ्यता की शुरुआत से ही कृषि ने पर्यावरण पर प्रभाव छोड़ा है और कृषि भी पर्यावरण से बहुत प्रभावित हुई है। मानव जाति का कायम रहना हमारी कृषि और पर्यावरणीय बदलावों पर बहुत अधिक निर्भर करता है।

भारत खाद्य संकट से गुजर रहा है। पिछले पांच दशकों से रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, एक फसली खेती और अन्य कृषि व्यवहारों के जरिए कृषि भूमि और खाद्य उत्पादन प्रणाली को व्यवस्थित तरीके से बर्बाद किया गया है। वास्तविक समस्या पर गौर करने के बजाय सरकार आनुवांशिक इंजीनियरिंग (GE) से तैयार की जाने वाली खाद्य फसलों जैसे कृत्रिम उपायों पर जोर दे रही है।

पारिस्थितिक खेती यानी इकोलोजिकल फार्मिंग हमारे देश में कृषि के सामने उपस्थित समस्याओं का माकूल जवाब है। यह हमारी खेती को भी टिकाऊ बनाए रखता है। कृषि का यह स्वरूप हमारी भूमि और जल संसाधनों का संरक्षण करता है, कृषि विविधता को बढ़ाता है, जैव –विविधता को सुनिश्चित करता है और खाद्य व आजीविका-सुरक्षा की मांग को पूरा करता है।

संक्षेप में, यह सुनिश्चित करता है कि पर्यावरण फले-फूले, खेती उत्पादक बनी रहे, किसान को पर्याप्त मुनाफा मिले और समाज को पर्याप्त पौष्टिक आहार उपलब्ध रहे। भारत का अपना लंबा कृषि-इतिहास रहा है। सदियों से इस देश में किसानों ने खेतों की उर्वरता बनाए रखने के लिए तरह-तरह के तरीके विकसित किए हैं। मिश्रित फसल, चक्रीय फसल, खाद का प्रयोग और कीट-रोधी प्रबंधन जैसे उपायों से हमारी कृषि टिकाऊ या संवहनीय बनी रही।

1965 में तथाकथित हरितक्रांति द्वारा थोपे गए कृषि के रसायन-संकेंद्रित मॉडल के घातक हमले से स्थिति बदतर होती गई। जब संयुक्त राष्ट्र संघ और विश्वबैंक की पहल से शुरू हुआ संस्थान ‘इंटरनेशनल असेसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंस एण्ड टेक्नोलाजी फॉर डेवलपमेंट' (IAASTD) इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि यदि मौजूदा खाद्य संकट को दूर करना है तो छोटे पैमाने की खेती और कृषि-पारिस्थितिक प्रणाली को अपनाना होगा।

इस पहल (IAASTD)की संकल्पना में,पूरी दुनिया में लगभग 400वैज्ञानिकों द्वारा पिछले 50 सालों में प्रयुक्त सभी कृषि प्रौद्योगिकियों की एक त्रिवर्षीय समीक्षा शामिल है। IAASTD ने कहा कि स्थानीय समुदायों की जरूरतों को पूरा करने के लिए देसी और स्थानीय ज्ञान को औपचारिक विज्ञान के बराबर का महत्व देना होगा। यह बर्बादी की हद तक नुक्सानदायक रसायन-निर्भर कृषि के हर जगह लागू किए जाने वाले एकसमान मॉडल से अलग सोच थी।

इस रिपोर्ट में यह भी स्वीकार किया गया कि आनुवांशिक इंजीनियरी से विकसित फसलें बहुत ही विवादास्पद हैं और जैव-विविधता की हानि, जलवायु परिवर्तन जैसी बुनियादी समस्याओं को हल करने में भी कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभा पाएंगी।

अभियान कथा:

ग्रीनपीस विज्ञान का विरोधी नहीं है, ना ही वह खेती की अधिक सक्षम पद्धतियां विकसित करने के खिलाफ है। मगर हम कारपोरेट जगत के फायदे के लिए भूमि, जल और पर्यावरण के विनाश का समर्थन नहीं कर सकते। ना ही हम मानव प्राणियों को नई फसलों के परीक्षण के लिए गिनिपिग बनने देंगे। इस बात को ध्यान में रखते हुए संपोषणीय खेती अभियान फिलहाल निम्न बिन्दुओं पर केंद्रित है:

उर्वरक अभियान: घटती उर्वरता के साथ भूमि का क्षरण, विषाणुओं से युक्त खाद्य पदार्थ और भारी कार्बन उत्सर्जन। रासायनिक उर्वरक ठीक ऐसा ही कुछ इस देश में कर रहे हैं। अब समय आ गया है कि हम इनको छोड़ कर खेती के पारिस्थितिक उपायों की तरफ बढ़ें, जो देश के कई हिस्सों में सफल सिद्ध हुए हैं।  

जीई(GE) अभियान: खाद्य संकट के संपूर्ण हल का ढोंग करने वाली जीई फसलें हालात को और बिगाड़ेंगी ही। तमाम बातों के अलावा, उन्होंने मानव स्वास्थ्य को खतरे में डाल दिया है। इसके साथ ही खाद्य सुरक्षा के मामलों में उसका रुख समझौतावादी है। जीई फसलों को किसी भी कीमत पर खुली छूट नहीं मिलनी चाहिए।

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