आई.टी. क्षेत्र में ऊर्जा क्रांति की जरूरत

जलवायु परिवर्तन की वैज्ञानिक तत्परता मांग करती है कि हमें एक स्वच्छ ऊर्जा क्रांति की जरूरत है, न कि धीमी प्रक्रिया की। मौजूदा ऊर्जा प्लेटफार्म को अपेक्षित कटौती-स्तर तक पहुंचने के लिए अधिक साफ-सुथरा या अधिक आधुनिक बनाना काफी नहीं है। जिस तरीके से हम ऊर्जा उत्पादित और उसका उपभोग करते हैं, उसमें क्रांति लाने की जरूरत है।

स्वच्छ ऊर्जा क्रांति सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी क्षेत्र के द्वारा ही उत्प्रेरित की जा सकती है, क्योंकि उसके पास भविष्य में जरूरी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती करने और न्यून कार्बन अर्थनीति सृजित करने के व्यापक उपाय हैं। इस क्षेत्र के लिए यह विजयोन्मुख स्थिति है – पृथ्वी ग्रह को सूचना प्रौद्योगिकी द्वारा आविष्कृत उपायों का लाभ है तो कंपनियों को ये उपाय उपलब्ध कराने से लाभ है।

ग्रीनपीस सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी क्षेत्र से संवाद कायम करता है और तेजी से होने वाले जलवायु परिवर्तन में अपनी भूमिका कम करने के उपायों पर सक्रियता के साथ विचार करने के लिए उसे राजी कर लिया है। 2009 में हमने बेहतर आई.टी. चुनौती मूल्यांकन रिपोर्ट जारी की। उसमें जलवायु नेतृत्व के मुद्दों और जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के व्यावसायिक उपायों पर 12 आई.सी.टी. ब्रांडों को श्रेणीबद्ध किया गया है। ग्रीनपीस ने चुनौतियां दी है और आई.सी.टी. क्षेत्र के अंतर्गत क्रांति होने की उम्मीद कर रहा है।

अभियान कथा:

भावी समाधान प्रदाता के रूप में आई.सी.टी. की सत्ता और कार्बन पदचिह्न वृद्धि में विरोधाभास है। भारतीय आई.सी.टी. क्षेत्र 10 प्रतिशत वैश्विक आई.सी.टी. उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है और 12-16 प्रतिशत विकास दर के चलते 2020 तक यह चीन के बाद दूसरे नंबर पर भारत को कार्बन उत्सर्जक के रूप में खड़ा कर देगा।

ऑनलाइन सेवा की मांग में तेज वृद्धि डाटा सेंटरों और नेटवर्क टावरों की संख्या भी बढ़ा रहा है। कंपनियां जहां उद्यमिता लागत को कम करने की अपनी क्षमता बढ़ाने में लगी हैं, वहीं उनका विकास नए आई.टी. अवसंरचना में दक्षता की भरपाई करता है। इससे भी आगे, इससे ऊर्जा की मांग-आपूर्ति की खाई भी बढ़ रही है।

अतः ग्रीनपीस की योजना है कि आम तौर पर आई.सी.टी. के बढ़ते पड़ावों के महत्वपूर्ण परिणाम को चिह्नित किया जाए ताकि आई.सी.टी. के बुनियादी ढाँचे के विस्तार और ऊर्जा उत्पादन के चलते बढ़ते जीवाश्मों के बीच के संबंध को भी उजागर किया जा सके। इससे यह समझने में भी मदद मिलेगी कि मौजूदा आम व्यावसायिक रवैये से बिगड़े जलवायु परिदृश्य में व्यवसाय वृद्धि की गति बरकरार नहीं रह पाएगी। इसलिए कंपनियों को उत्सर्जन से जुड़े विकास से किनारा करके न्यून कार्बन ऊर्जा स्रोतों में अपनी लागत बढ़ानी चाहिए।

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