जलवायु का प्रभाव

कोई नहीं जानता कि गर्मी की कितनी मात्रा ‘सुरक्षित’ है। पर हमें ये जरूर पता है कि जलवायु परिवर्त्तन लोगों एवं पारिस्थितिक तंत्र को पहले से ही नुकसान पहुंचा रहा है । इसकी सच्चाई ग्लेशियरों के पिघलने, ध्रुवीय बर्फ के खंडित होने, परिहिमन क्षेत्र के विगलन, मानसून के तरीके में परिवर्तन, समुद्र के बढ़ते जल स्तर, बदलते पारिस्थितिक तंत्र एवं घातक गर्म तरंगों में देखी जा सकती है।

इन परिवर्तनों के बारे में बात करने वाले अकेले वैज्ञानिक ही नहीं हैं, हिमाचल के सेब उत्पादकों से लेकर विदर्भ के किसानों तथा सुंदरबन के लुप्त हो रहे द्वीपों पर रहने वाले लोग भी जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से जूझ रहे हैं।

लेकिन यह तो महज शुरूआत है । हमें विपत्तिजनक जलवायु परिवर्तन से बचने के लिए कदम उठाने की जरूरत है। यद्यपि अभी तक इसके सभी क्षेत्रीय प्रभावों की जानकारी नहीं है, पर यदि हम मौजूदा प्रवृत्ति को जारी रहने की अनुमति देते हैं तो इसके कुछ संभावित भावी परिणाम हैं ।

सामान्य से लेकर मध्यम गर्मी के संभावित एवं त्वरित प्रभाव:

  • वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण पिघलते ग्लेशियरों एवं महासागरों के तापीय विस्तार से समुद्र के जल स्तर में वृद्धि।

  • िघलते परिहिम क्षेत्र एवं समाप्त होते वनों से ग्रीन हाउस गैसों का भारी मात्रा में उत्सर्जन।

  • गर्म तरंगों, सूखा एवं बाढ़ जैसी एकतरफा मौसमी घटनाओं का खतरनाक जोखिम। गत 30 वर्षों में सूखा पड़ने की घटनाएं विश्व स्तर पर पहले से ही दोगुनी हो गई हैं।

  • गंभीर क्षेत्रीय प्रभाव – जैसे: यूरोपीय नदियों की बाढ़ में वृद्धि होगी और समुद्रतटीय क्षेत्रों में बाढ़, कटाव एवं आर्द्र भूमि की कमी का खतरा काफी बढ़ जाएगा ।

  • ग्लेशियरों, मूंगे की चट्टानों, वनस्पतियों (मैंग्रोव), आर्कटिक एवं अल्पाइन परितंत्रों, उदीच्य वनों, उष्णकटिबंधीय वनों, प्रेयरी आर्द्र प्रदेशों और घास के देशी मैदानों सहित प्राकृतिक तंत्र की एक साथ क्षति होने वाली है ।

  •   अनेक प्रजातियों के विलुप्तीकरण एवं जैवविविधता में कमी का वर्तमान जोखिम और बढ़ेगा ।

  • सबसे बड़ा प्रभाव उन गरीब देशों पर होगा जो समुद्र के बढ़ते जल स्तर से अपने को सुरक्षित रखने में अल्प सक्षम हैं। एशिया, अफ्रीका एवं प्रशांत क्षेत्र के विकासशील देशों में बीमारियों का प्रसार होगा तथा कृषि उत्पादों में कमी होगी ।

  •  िकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के सभी स्तरों पर ज्यादा भुगतना होगा ।

बढ़ती गर्मी के दीर्घकालिक विपत्तिकारी प्रभाव:

  • ग्रीनलैंड एवं अंटार्कटिका में बर्फ के चादर पिघल रहे हैं, जब तक इसे रोका नहीं जाता तब तक उत्सर्जनजन्य गर्मी आगामी दशकों में एकाएक ग्रीनलैंड के बर्फ की चादर को अपरिवर्तनीय रूप से पिघला सकती है, जो आगामी कुछ सदियो़ में समुद्र के जल स्तर में 7 मीटर तक की वृद्दि करेगी। अंटार्कटिका के विभिन्न हिस्सों से बर्फ पिघलने के नए सबूत का मतलब है कि य़ह भी द्रवीभूत होकर समाप्त होने का जोखिम झेल रहा है।

  • अटलांटिक गल्फ स्ट्रीम के मंद होने, स्थान परिवर्तन या उसके बंद हो जाने का यूरोप में नाटकीय प्रभाव तो है ही, यह वैश्विक महासागरीय परिसंचरण तंत्र में भी खलल डाल रहा है।

  • महासागरों से मिथेन की खतरनाक उत्पत्ति वातावरण में तेजी से मिथेन को बढ़ाने में अग्रणी भूमिका निभा रही है।

आज तक, मानव इतने बड़े पर्यावरण संकट का सामना करने को कभी बाध्य नहीं हुआ है । यदि हम ‘ग्लोबलवार्मिंग’ को रोकने के लिए तुरंत आवश्यक कदम नहीं उठाते हैं तो इस नुकसान की पूर्ति नहीं हो सकेगी ।

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