कार्बन उत्सर्जन में कटौती

कोयला दहन से चलने वाले संयंत्र कार्बन डाई ऑक्साइड के मानव-कृत उत्सर्जन के सबसे बड़े स्रोत हैं। हमारे जलवायु के लिए अकेला सबसे बड़ा खतरा है यह कोल ऊर्जा। भारत में हमारे मौजूदा कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन का 40 प्रतिशत कोयला दहन आधारित ऊर्जा संयंत्रों द्वारा होता है।

व्यापक सूखा, बाढ़ और समुद्र-स्तर के बढ़ने से होने वाले भारी विस्थापन सहित जलवायु परिवर्तन के सबसे खराब प्रभावों से बचने के लिए हमें वैश्विक तापमान 2 डिग्री सेंटीग्रेड के नीचे रखना होगा (प्राक् औद्योगिक स्तरों की तुलना में)। ऐसा करने के लिए, वैश्विक स्तर पर ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन 2015 में शिखर तक पहुंचने के बाद धीरे-धीरे कम करके शून्य तक लाया जाना चाहिए।

भारत अमेरिका और चीन के बाद तीसरा सबसे बड़ा कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जक है। अगले 20 वर्षों में इस उत्सर्जन में भारी बढ़ोत्तरी होने की उम्मीद है। हमारे उत्सर्जन विभिन्न गतिविधियों के कारण होते हैं, किन्तु उसका सबसे बड़ा हिस्सा विद्युत क्षेत्र से उत्सर्जित होता है, क्योंकि आज हमारी ज्यादातर बिजली ऐसे ही तरीके से बनती है।

कोयला से चलने वाले ऊर्जा संयंत्र हमारी जरूरत का 70 प्रतिशत बिजली पैदा करते हैं और हमारे कुल कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन का 40 प्रतिशत इन्हीं संयत्रों से होता है। यदि हमें जलवायु परिवर्तन से निबटने में महत्वपूर्ण और जिम्मेदार भूमिका निभानी है तो कोयले पर अपनी निर्भरता कम करने के रास्ते पर आगे बढ़ना होगा और बिजली बनाने के नए अपेक्षाकृत साफ-सुथरे तरीकों को तलाशना होगा।

अभियान कथा:

हमारा कोयला अभियान, ऊर्जा उत्पादन में कोयले के इस्तेमाल का लोगों और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को उजागर करता है। हमारे पास भविष्य के ऊर्जा उत्पादन का बुनियादी ढांचा तैयार करने का अवसर है हमें इस अवसर का लाभ जरूर उठाना चाहिए।

िजली की मांग और देश के विकास के बहाने कोयला खनन और कोयला आधारित ऊर्जा संयंत्रों में भारी उछाल आया है। फिर भी कोयले से भारत का विकास और विकास की तमाम आकांक्षाएं कुछेक वर्षों से आगे पूरी नहीं हो सकेंगी। यह न तो सुरक्षित है और न ही संपोषणीय ऊर्जा विकल्प।

वस्तुतः यह उद्योग और सरकार के लिए एक जोखिम भरा निवेश है। हमारा अभियान यह प्रदर्शित करेगा कि कोयले की आपूर्ति सामाजिक और आर्थिक कारकों से बुरी तरह सीमित होती है और यह मध्य और दीर्घ अवधि के लिए बेकार का निवेश हो गया है। अभियान यह भी रेखांकित करेगा कि भारत की वैश्विक छवि और दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखते हुए कोयला समापन की ओर बढ़ना महंगा साबित होगा।

सीमित कोयला:

हमारे कोयले का बड़ा हिस्सा हमारे देश के कुछेक बचे हुए घने वनों वाले क्षेत्रों में अथवा घनी आबादी वाले क्षेत्रों में पाया जाता है। कोयला निकालने के लिए हमें या तो इन वनों को काटना होगा और/अथवा इन क्षेत्रों से भारी संख्या में लोगों को विस्थापित करना पड़ेगा। जब लोग विस्थापित होते हैं तो उसी स्तर के मिलते-जुलते स्थानों पर उनका पुनर्वास जरूरी होता है जहां वे नये सिरे से अपना जीवन-यापन कर सकें। चूंकि ऐसे स्थान पाना आसान नहीं है इसलिए हम लोगों को उनकी उम्मीदों के मुताबिक कभी पुनर्वासित कर ही नहीं पाएंगे।

अतः जहां कहने के लिए हमारे पास बहुत अधिक कोयला है, वहीं उस कोयले का उपयोग करने के रास्ते में अपरिहार्य अड़चनें भी हैं। इसलिए, हमें एक विकल्प के रूप में कोयले पर गौर करना बंद कर देना चाहिए और उस पर अपनी निर्भरता में भी कमी लाना तत्काल शुरू कर देना चाहिए।

हम कोयले की वास्तविक लागत की पड़ताल करेंगे और उसे प्रचारित करेंगे तथा लोगों और नीति निर्माताओं से अपील करेंगे कि वे सही विकल्पों का चुनाव करें।