हरित ऊर्जा को बढ़ावा 

ऊर्जा क्रांति (विकास ही नहीं) यह प्रदर्शित करती है कि कैसे दुनिया, आज जहां हम हैं वहां से निकल कर, ऐसी स्थिति में पहुंच सकती है जहां हम कार्बन डाई ऑक्साइड में कटौती करते हुए भी ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करके जीवाश्म ईंधनों से मुक्ति पा लेंगे। इसमें यह स्पष्ट करना भी शामिल है कि कैसे दुनिया में सिर्फ ऊर्जा एवं परिवहन क्षेत्रों से होने वाला कार्बन उत्सर्जन 2015 तक चरम पर पहुंच सकता है और कैसे 2050 तक उसमें 80 प्रतिशत कमी लाई जा सकेगी। इस तरह जीवाश्म ईंधनों से मुक्ति के दूसरे बड़े फायदे होंगे जैसेः जीवाश्म ईंधन की कीमतों का विश्व बाजार से स्वतंत्र हो जाना और लाखों नए ग्रीन जॉब का पैदा होना।

भारत में, चूंकि हमारी ऊर्जा अवसंरचना अभी तक पूरी तरह विकसित नहीं है, हमें सही चयन के अवसर उपलब्ध हैं। भविष्य में दुनिया की तस्वीर बदलने वाली प्रचुरता में उपलब्ध नवीकरणीय और पोषणीय (sustainable) ऊर्जा एवं भारत को ईंधन आपूर्त्ति के लिए परावलंबी बनाने वाली पुरानी दूषित टेक्नोलाजी के बीच हम चुनाव कर सकते हैं, चाहे वह नाभिकीय ऊर्जा हो अथवा कोयला और तेल से बनने वाली ऊर्जा।

विक्रेंद्रीकृत अक्षय ऊर्जा:

इस क्रांति का मार्ग प्रशस्त करने के लिए ग्रीनपीस इंडिया विकेंद्रित नवीकरणीय ऊर्जा (DRE) को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहा है। विकेंद्रित ऊर्जा व्यवस्था की परिकल्पना इस विचार पर आधारित है कि ऊर्जा को किसी एक विशाल केंद्र पर उत्पादित करने और फिर लंबी दूरी तक उसका परिवहन किए जाने की जरूरत नहीं है। उसका उत्पादन जहां जरूरत हो उन्हीं स्थानों के पास किया जा सकता है, और प्रायः उन लोगों के नियंत्रण में जिन्हें उसका उपयोग करना है।

चूंकि विकेंद्रित ऊर्जा व्यवस्था लोगों की स्थानीय स्तर पर सेवा करती है, इसलिए वह केंद्रीकृत व्यवस्था के बड़े पावर स्टेशनों की तुलना में अनिवार्य रूप से छोटी होगी। नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियां इस तरह के लघु पैमाने के ऊर्जा उत्पादन के अनुकूल हैं और उनसे लाभ यह है कि वे हवा, जल आसपास रहने वाले लोगों की जमीन को प्रदूषित नहीं करेंगी। नवीकरणीय ऊर्जा प्रद्यौगिकियां ग्रीनहाउस गैसों को भी नहीं पैदा करतीं और इसलिए जलवायु परिवर्तन में कोई बढ़ोत्तरी नहीं करेंगी।

भारत में, जहां देश के विशाल आकार और ऊर्जा की भारी कमी की वजह से अधिकांश लोग – खास करके ग्रामीण क्षेत्रों के लोग – अपनी बिजली आपूर्ति पर भरोसा नहीं कर सकते, डीआरई (विकेंद्रित) व्यवस्था खास तौर से प्रासंगिक है। इतने छोटे पैमाने पर काम करने का मतलब है कि ऊर्जा आपूर्ति के तरीके समुदाय की जरूरत के मुताबिक अपनाये जा सकते हैं।

उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर करते हुए, लोग सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, माइक्रो हाइड्रो टेक्नोलाजी का इस्तेमाल करके गतिशील जल से प्राप्त ऊर्जा, अथवा इन तीनों के समुच्चय में से कोई भी चुनाव कर सकते हैं। नवीकरणीय ऊर्जा के और भी कई रूप दुनिया में उपलब्ध हैं और हम बेहतर तरीके से उनका इस्तेमाल करने में भी सक्षम हो रहे हैं। प्रणालियां अलग-थलग हो सकती हैं – जिन्हें ‘स्टैण्ड अलोन’ कहा जाता है – अथवा मुख्य बिजली ग्रिड से उन्हें जोड़ा जा सकता है – जिन्हें ‘ग्रिड इंटरैक्टिव’ कहा जाता है। ‘ग्रिड इंटरैक्टिव’ प्रणाली का लाभ यह है कि उसके स्वामी अतिरिक्त उत्पादन होने की स्थिति में वस्तुतः ग्रिड को ऊर्जा बेच भी सकते हैं जिससे उनको आमदनी का नया जरिया मिल सकता है, या फिर स्वयं अधिक ऊर्जा हासिल कर सकते हैं यदि कभी उन्हें अधिक की जरूरत पड़ी।

विकेंद्रित व्यवस्था का चलन पूरे भारत में बढ़ रहा है, एक लाख से अधिक लोग चावल की भूसी से बनी ऊर्जा का इस्तेमाल कर रहे हैं। लद्दाख में, आदिवासी समुदाय अपने कृषि उत्पादों की प्रोसेसिंग माइक्रो-हाइड्रो ऊर्जा से संचालित मशीनों से करते हैं। कर्नाटक में, ग्रामीण गोबर की खाद से बनी गैस पर खाना पका रहे हैं। हम इस तरह के कुछ और उदाहरण एकत्र कर रहे हैं, जिन्हें हम शीघ्र ही ब्यौरेवार पोस्ट करेंगे।