सुरक्षा  

' मानवीय भूल, व्यवस्था में गड़बड़ी, भूकंप  या फिर आतंकी हमले से जलवायु में रेडियो एक्टिव तत्वों  के फैलने के  खतरे की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता, भले ही यह संभावनाएं कितनी ही मामूली क्यों न हों'..

 

                                                परमाणु और रेडियोलॉजिकल आपात स्थिति के प्रबंधन पर दिशा-निर्देश  

                                           राष्‍ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण , भारत सरकार  

सभी परमाणु विद्युत संयंत्र स्‍वाभाविक रूप से खतरनाक हैं। वे कभी भी प्रकृतिक आपदा, मानवीय भूलों या डिजाइन की विफलता की चपेट में आ सकते हैं। भारत में संस्‍थागत दोष इस ज़ोखिम को और बढ़ा देते हैं। लेकिन इस सब के बावजूद इन खतरों को नियमित रूप से और स्‍वाभाविक तौर से परमाणु प्रतिष्‍ठानों द्वारा कम करके बताया जा रहा है ।

एक प्रचलित मिथक यह है कि परमाणु शक्ति हाल के वर्षों में सुरक्षित हो गई है । अब यह जलवायु परिवर्तन से जुड़ी समस्याओं  का हल है - यह हमें तेल संकट से निपटे के लिए पर्यावरण के अनुकूल एक विकल्‍प प्रदान करती है । लेकिन सच्‍चाई ये है कि परमाणु ऊर्जा का महतवपूर्ण मात्र में उत्पादन करके भी हम बहुत ही मामोली co2  रिडक्शन हासिल कर सकते हैं और  परमाणु ऊर्जा उत्पादन के लिए लगे  रियेक्‍टर आज भी उतने ही असुरक्षित हैं जितना  20वीं सदी में थे । परमाणु ऊर्जा और रिएक्टरों की क्षमता में प्रगति का यदि सच में कोई असर है तो वो यह कि दुर्घटना कि स्थिति में उसके  संभावित परिणाम और भी भयानक हो जाएँगे ।   

गलतियाँ तो होती ही हैं । परमाणु क्षेत्र से जुदा इतिहास घटनाओं  और दुर्घटनाओं और खतरे से बाल बाल बचने वाली कहानियों से भरा पड़ा है। अगर गिनने बैठें तो साल के हर दिन के लिए एक या उससे ज्‍यादा कहानियाँ मौजूद होंगी – पूरे 365 दिनों के लिए 365  खतरों से भरी कहानियाँ। चेर्नोबल से पहले भी दुर्घटनाएँ हुई थीं । चेर्नोबल के बाद भी हुईं । हर बार केवल बहाने और स्‍पष्‍टीकरण अलग थे। ये जाना जाता है कि परमाणु उद्योग से जुड़े लोगों ने कमियों में सुधार की मंहगी मरम्‍मत और संयंत्रो को बंद करने की लम्बी प्रक्रिया से बचने के लिए कुछ मामलों में सुरक्षा और निरीक्षण के आंकड़ों में हेर फेर की है । भारतीय परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में बरती  जाने वाली गोपनीयता ऐसे खतरों की आशंका को और बल देती है ।

आज भी आलम यह है कि अपने रोज़ मर्रा के सामान्य क्रिया कलापों के तहत भी परमाणु ऊर्जा संयंत्र नियमित रूप से हवा और पानी में रेडियोएक्टिव पदार्थों का निष्‍कासन करते हैं । परमाणु कचरा, जो परमाणु ऊर्जा का एक घातक उपोत्‍पाद है और जिसके लिए कोई दीर्घकालिक हल मौजूद नहीं है, पीढि़यों तक रेडियोधर्मी रहता है।    

परमाणु शक्ति के समर्थक परमाणु ऊर्जा उत्पादन को सामान्य ऊर्जा उत्पादन के मापदंडों पर ही तौलना चाहते हैं। ये तभी हो सकता है जब इससे जुड़े जोखिमो और खतरों को बिल्‍कुल अप्रासंगिक कह कर किनारे कर दिया जाए और मान लिया जाए कि हम परमाणु ऊर्जा उत्पादन की कीमत  मानव समाज को इससे होने वाले खतरनाक प्रभावों के रूप में चुकाने तको तैय्यार हैं । परमाणु ऊर्जा समर्थक  इस कीमत को चुकाने को तैयार होंगे, ग्रीनपीस नहीं।

हमारे पास वैकल्पिक ऊर्जा स्त्रोत जैसे, सौर, पवन या माइक्रो-हाइड्रो ऊर्जा मौजूद हैं भारत की बिजली की जरूरत को तेजी से पूरा करने के लिए इस विकल्पों का इस्तेमाल किया जा सकता है। न तो ये जीवाश् ईंधन की तरह जलवायु परिवर्तन को बढ़ाएंगे और ही एक रेडियोधर्मी विरासत छोड़कर जाएंगे, साथ ही इनसे किसी रेडियोधर्मी दुर्घटना का खतरा भी नहीं है भारत जिस तरह से परमाणु शक्ति में निवेश करके हमारे बच्चों और हमारे देश के   स्वास्थ्य के साथ जुआ खेल रहा है उसे रोकना होगा

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