हमारी जीत

Standard Page - फरवरी 1, 2012
महीनों और सालों अभियान चलाने के बाद ही कहीं कोई एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है। आइए, सफलता की हमारी कहानियों पर एक नजर डालें और देखें कि कैसे हम निर्णायक बदलाव ला पाए हैं।

2010

ग्रीनपीस परमाणु जवाबदेही बिल में परिवर्तन लाने में प्रभावी हुआ है।: राजनीतिक गलियारों में चले एक लम्बे नाटकीय घटनाक्रम के बाद परमाणु जवाबदेही बिल संसद के मानसून सत्र में दोनों सदनों से पास हो सका । संशोधित बिल आपूर्तिकर्ता (सप्लायर) पर पूरी तरह जवाबदेही लादता है ( यह ग्रीनपीस इंडिया की प्रमुख मांगों में से एक मांग थी )। हालांकि बिल में असीमित जवाबदेही की हमारी मांग के लिए प्रावधान नहीं है, लेकिन तत्काल हर्जाने की राशि 500 करोड़ रुपये ज़रूर कर दी गई। इसके अलावा, बिल में एक धारा यह भी जोड़ दी गयी है कि दुर्घटना की गंभीरता और पैमाने को देखते हुए सरकार चाहे तो हर्जाने की राशि बढ़ा भी सकती है।

जनशक्ति सर्वोपरि: ग्रीनपीस द्वारा प्रधानमंत्री के पास ऑनलाइन याचिकाएं भेजने का अभियान शुरू किया जिसका उद्देश्य था नाभिकीय जवाबदेही बिल पास होने से पहले सार्वजनिक विचार-विमर्श की ज़रुरत पर प्रधानमंत्री का ध्यान खींचना । इन याचिकाओं पर लगभग दो लाख लोगों ने हस्ताक्षर किए और ये हस्ताक्षर प्रधानमंत्री कार्यालय को फैक्स से तब तक भेजे जाते रहे जब तक कि उन्होंने हमारी लाइन ही ब्लॉक नहीं कर दी। इस बिल की निगरानी कर रही स्थाई समिति द्वारा जनसंपर्क किए जाने की मांग को लेकर भेजी गई याचिका पर हमने 1.87 लाख हस्ताक्षर प्रस्तुत किए थे। इसके तुरंत बाद स्थाई समिति ने आणविक जवाबदेही बिल पर व्यापक जनसंपर्क किए जाने की घोषणा करते हुए एक विज्ञापन प्रकाशित कराया था।

मायापुरी का पर्दाफाश: ग्रीनपीस के एक विकिरण विशेषज्ञ दल ने दिल्ली के मायापुरी के उस कचरा-स्थल के कई दौरे किए जहां के बारे में खबर थी कि विकिरण से प्रभावित होकर 6 लोग अस्पताल में भर्ती किए गए थे। अधिकारियों ने उस क्षेत्र की छानबीन की थी और उसे स्वच्छ घोषित कर दिया था, लेकिन ग्रीनपीस दल ने वहां ऐसे नाजुक स्थलों की शिनाख्त की जहां विकिरण का स्तर खतरे की सीमा के ऊपर पाया गया था । दो स्थल तो ऐसे थे जहां विकिरण का स्तर सामान्य की तुलना में 5000 गुना अधिक था।

ई-कचरा निस्तारण नीति : 15 मई 2010 को पर्यावरण एवं वन मंत्री ने घोषणा की कि सरकार ने देश में ई-कचरा नियमित निस्तारण के लिए नए नियम बनाए हैं। इन नये नियमों की उत्पत्ति का आधार थी अप्रैल 2008 में बंगलूरु में हुई ग्रीनपीस द्वारा आयोजित बड़े इलेक्ट्रानिक उत्पादकों की एक बैठक । बैठक में हुए संवाद का लक्ष्य था ई-कचरा निस्तारण के संबंध में औपचारिक कानून बनाने के लिए जमीन तैयार करना।

विप्रो प्रथम स्थान पर:: ‘ग्रीनपीस द्वारा जारी ‘ग्रीनपीसेज गाइड टू ग्रीनर इलेक्ट्रॉनिक्स’ के अद्यतन संस्करण में मशहूर सेलफोन ब्रांड नोकिया के साथ साथ भारत की अग्रणी आई टी कंपनी विप्रो भी अपने लिए जगह बना कर अग्रणी स्थान पर काबिज हो गयी ।

बीटी बैंगन अधिस्थगन: तत्कालीन पर्यावरण एवं वन मंत्री जयराम रमेश ने देश में बीटी बैंगन की खेती और व्यापार करने संबंधी मामले का निपटारा करने से पहले सार्वजनिक विमर्श की घोषणा की। चार साल तक अनुवांशिक रूप से संवर्धित यानी जेनेटिकली मैन्युफैक्चर्ड खाद्य उत्पादों के खिलाफ चली सार्वजनिक बहसों और बीटी बैंगन विरोध के विवाद में पूरे देश ने हिस्सा लिया। इसकी वजह से सरकार को बीटी बैंगन के व्यवसाय पर अनिश्चितकालीन अधिस्थगन की घोषणा करनी पड़ी।।

2009

कछुआ मृत्यु दर में गिरावट : ग्रीनपीस समुद्री मत्स्य उद्योग कानूनों के बेहतर क्रियान्वयन के लिए ओड़ीशा में काम करता रहा है। 2006 से ओड़ीशा में अवैध रूप से मछली मारने को रोकने हेतु सक्रिय समुद्री गश्ती के रूप में धीमी किन्तु लगातार प्रगति दिखाई देती रही है, जिससे स्टेट मैरीन फिशरीज रेगुलेशन एक्ट को बेहतर ढंग से लागू किया जा सका है।

बैन द बल्ब: ग्रीनपीस इंडिया ने 2006 में ‘बैन द बल्ब’ अभियान आरंभ किया, जिसके तहत 2012 तक अक्षम रोशनी बल्बों पर रोक लगाने की मांग की गई। 250,000 से अधिक लोगों ने ‘बैन द बल्ब’ याचिका पर दस्तखत किए, जिसमें साधारण ताप दीप्त बल्बों को हटा कर उनकी जगह अधिक सक्षम प्रकाश व्यवस्था करने की मांग की गई। इस संदेश को चौतरफा प्रसारित करने वाली हमारी मानव-श्रृं खला में बहुत से लोग शामिल हुए, जबकि अन्य बहुत से लोगों ने घरों, दुकानों और होटलों में बल्ब बदलने के ग्रीनपीस के ‘धावों’ (raids) में भागीदारी की। तीन साल तक रचनात्मक अभियान चलाए जाने का नतीजा सरकार द्वारा ‘बचत लैम्प योजना’ की घोषणा के रूप में सामने आया।

पंजाब में रासायनिक उर्वरक प्रदूषित जल: नवंबर 2009 में ग्रीनपीस ने ‘केमिकल फर्टिलाइजर्स इन आवर वाटर’ नामक अपनी वैज्ञानिक रिपोर्ट जारी करके यह दिखाया कि किस तरह पंजाब में रासायनिक उर्वरकों से निःसृत नाइट्रेटों से भू-जल दूषित हो चुका है। इसका नतीजा यह हुआ कि पंजाब राज्य मानवाधिकार आयोग ने इस मामले में जांच शुरू कर दी और सरकार को स्पष्टीकरण देने का आदेश दिया।

बंदरगाह सुरक्षा: 2009 में, ग्रीनपीस मछुआरा समूहों और स्वयंसेवी संगठनों के साथ मिल कर चलाये गए उस अभियान का हिस्सा बना जिसने सरकार को समुद्रतटीय क्षेत्र प्रबंधन अधिसूचना को वापस लेने के लिए राजी कर लिया. इस अधिसूचना से पूरे तटीय इलाके के औद्योगीकरण की चपेट में आने का अंदेशा था। उसी सहयोग अभियान में साथ मिलकर हम अब सरकार से मांग कर रहे हैं कि वह आजीविकाओं और तटीय पारिस्थितिक तंत्र की रक्षा के लिए जारी सीआरजेड (CRZ) अधिसूचना को और मजबूत बनाए।

अनुवांशिक रूप से संवर्धित फसल विरोधी अभियान: साल के शुरू में ही तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने अपना वादा निभाया और अनुवांशिक रूप से संवर्धित फसलों के उत्पादन को अनुमति देने वाली जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (GEAC) की जनवरी में हुई बैठक में सरकार के प्रतिनिधियों ने बीटी बैंगन की स्वीकृति का विरोध किया। भारत में बीटी बैंगन का विकास करने वाली कंपनी माइको द्वारा बीटी बैंगन जैविक सुरक्षा पर पेश की गयी रिपोर्टों की भारतीय और विदेशी वैज्ञानिकों द्वारा की गयी स्वतंत्र वैज्ञानिक समीक्षाओं के नतीजों से अधिकारियों को यह कदम उठाने में मदद मिली।

जन सुनवाई से नीतिगत समीक्षा को मदद: 2009 में हमने ‘सबसिडाइजिंग फूड क्राइसिस’ रिपोर्ट के जरिए उर्वरकों पर अपना जन अभियान शुरू किया, जिसने व्यापक स्तर पर लोगों का ध्यान खींचा। इसी समय के आसपास सरकार ने भी रासायनिक उर्वरकों के लिए सबसिडी प्रणाली में परिवर्तन लाने पर चर्चा शुरू कर दी। ग्रीनपीस ने अपना लॉबिंग का काम जारी रखा और जन सुनवाइयां आयोजित की जिसके परिणामस्वरूप नीति की समीक्षा के लिए यह स्थाई समिति बन पाई।

समुद्री निधि का मॉडल: ओड़ीशा के गहिरमाथा समुद्री अभ्यारण्य में हमारा लक्ष्य भारत के अन्य हिस्सों में एक समुद्री संरक्षण की दिशा में एक संदर्भ कायम करना है। इस काम के लिए हमने पारंपरिक मछुआरों से मित्रता कायम की, राज्य और केंद्र सरकार के साथ लॉबिंग की, ज़मीनी कार्रवाइयां की और हल निकाले।

सुरक्षित खाद्य गाइड: भारत में जब अनुवांशिक रूप से संवर्धित खाद्य उत्पादों को लेकर विवाद जोर पकड़ रहा था, ग्रीनपीस ने ऐसे खाद्य पदार्थों के सिलसिले में देश में अपना पहला उपभोक्ता अभियान 'सुरक्षित खाद्य गाइड' (Safe food Guide) शुरू किया। इस गाइड ने जीएम खाद्य पदार्थों से संबंधित सभी ब्रांडों को अपने उत्पादों में प्रयुक्त अनुवांशिक रूप से परिवर्धित खाद्य सामग्रियों के बारे में एलान करने के लिए बाध्य किया । गाइड में सम्मलित सभी ब्रांडों ने ‘वर्तमान में जीएम मुक्त’ स्थिति का बयान जारी किया था, जबकि उनमें से एक ने भविष्य में भी ‘जीएम मुक्त’ बने रहने का संकल्प लिया था । इस उपभोक्ता अभियान ने न सिर्फ एक मजबूत ऑनलाइन आंदोलन छेड़ दिया, बल्कि उन खाद्य ब्रांडों को अपनी सही स्तिथि ज़ाहिर करने के लिए मजबूर कर दिया , जिनकी स्थति पहले भ्रामक बनी हुई थी। इससे उपभोक्ता समूहों के आपसी संबंध भी मजबूत हुए और भारत में उपभोक्ता समूहों की प्रमुख संस्था कंज्यूमर कोर्डिनेशन कौंसिल की तरफ से प्रधानमंत्री और पर्यावरण मंत्री को जीन परिवर्धित फसलों को बाज़ार में लाने से रोकने की मांग करते हुए पत्र लिखा जा सका।

2008

बीटी बैंगन संबंधी चिंताओं से स्वास्थ्य मंत्री सहमत: जब अनुवांशिक रूप से संवर्धित फसलों की उपज बी टी बैंगन को पहली बार बाज़ार में व्यवसायिक रूप से उतारने की तैयारियां ज़ोरों पर थी उसी समय इसके विरोध में चल रहा जन अभियान ‘आई एम नो लैब रैट ’ भी जोर पकड़ रहा था। एक लम्बे ऑनलाइन प्रचार अभियान, देश भर के विभिन्न स्वयं सेवी संगठनो द्वारा एकजुट होकर लगातार बी टी बैंगन के विरोध में याचिकाएं फैक्स किए जाने और ग्रीनपीस द्वारा की गयी सीधी कारवाईयों की बदौलत, इस वर्ष के अंत तक हम तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री को बीटी बैंगन संबंधी जनता की चिंताओं पर ध्यान देने के लिए मजबूर कर सके । पहली बार एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री ने बीटी बैंगन संबंधी चिंताओं को अपना समर्थन दिया और वादा किया कि स्वास्थ्य मंत्रालय बीटी बैंगन की स्वीकृति रोक देगा। ।

बाज़ार में मौजूद अवैध अनुवांशिक रूप से संवर्धित खाद्य पदार्थों का पर्दाफाश: ग्रीनपीस ने देश में अवैध अनुवांशिक रूप से संवर्धित खाद्य पदार्थों की मौजूदगी का पर्दाफाश किया। चूंकि जीईएसी (जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी) हमेशा की तरह अवैध अनुवांशिक संवर्धित खाद्य पदार्थों की मौजूदगी और भारतीय बाजार में उसे बेचे जाने से इनकार कर रही थी, हमने ठीक उनकी नाक के नीचे दिल्ली की खुदरा दुकानों से लाए गए खाद्य उत्पादों का परीक्षण करके उन्हें गलत साबित कर दिया और यह दिखा दिया कि हर तीन ऐसे खाद्य उत्पादों में से कम से कम एक जरूर जीई घटकों से युक्त पाया गया। यह उत्पाद था पेप्सीको इंटरनेशनल का उत्पाद ‘डोरिटोस कॉर्न’। इसके बाद ही डायरेक्टर जेनरल ऑफ फारेन ट्रेड ने जीन संवर्धित खाद्य पदार्थों के अवैध आयात की जांच कराई।

भारत में अनुवांशिक रूप से संवर्धित फसलों पर पहली रिपोर्ट:भारत में अनुवांशिक रूप से संवर्धित फसलों के बारे में बहुत कम जानकारी और सूचना उपलब्ध थी और जो जानकारी उपलब्ध थी वो सामान्य लोगों की पहुँच से बहुत दूर विभिन्न शोध संस्थानों की वेबसाइटों और फाइलों में छुपी हुई थी। ग्रीनपीस भारत में अनुवांशिक रूप से संवर्धित फसलों सम्बन्धी पहली रिपोर्ट को सामने लाया और ऐसी फसलों को लेकर चल रही गड़बड़ियों का भंडाफोड़ किया। देश में अनुवांशिक रूप से संवर्धित फसलों पर चल रहे अनुसंधान की गहराई और विस्तार पर भी यह पहली रिपोर्ट थी।।

सूचना के अधिकार ने जैविक सुरक्षा रिपार्ट को सार्वजनिक कराया: ग्रीनपीस ने सूचना के अधिकार को हथियार बना कर 30 महीनों तक लगातार इस बात के लिए संघर्ष किया कि अनुवांशिक रूप से संवर्धित फसलों के नियमन के लिए बनी नोडल एजेंसी जीईएसी, जैविक सुरक्षा अध्ययन रिपोर्ट को सार्वजनिक करे । आखिरकार जीईएसी को यह सूचना स्वतंत्र वैज्ञानिकों को समीक्षा के लिए उपलब्ध करवानी पड़ी ।

2007

जीई चावल परीक्षण ठप: जीईएसी ने अपनी बैठक में घोषणा की कि देश के पांच प्रदेशों में व्यापारियों और किसानों के हितों की सुरक्षा के लिए खेतों में जीई चावल परीक्षण/ वाणिज्यीकरण रोक दिया जाएगा।

2006

क्लेमेंसो वापस भेजा गया: फ्रांसीसी राष्ट्रपति शिराक ने एसबेस्टस लदे युद्धपोत क्लेमेंसो को वापस बुलाने की नाटकीय घोषणा की। यह पोत वापस फ्रांस चला गया। हमारी कार्रवाइयों, शिराक को किए गए ईमेल और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फ्रांस को शर्मसार करने की हमारी कोशिशों ने फ्रांस को मजबूर कर दिया कि वह भारत में अपने जहरीले कचरे को डंप करने के दिग्भ्रमित प्रयास को बंद कर दे।

जीई परीक्षणों के खिलाफ चावल निर्यातक: ग्रीनपीस,आल इण्डिया राईस एक्सपोर्ट असोसिअशन यानी AIREA (जिसमें देश की 70 अग्रणी चावल निर्यात कम्पनियां शामिल हैं ) को देश में हो रहे अनुवांशिक रूप से संवर्धित चावल की फसलों के फील्ड ट्रायल के खिलाफ लामबंद करने में सफल रही ।

2005

किसानों को अपना हक मिला: ग्रीनपीस ने नई दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन में घोषणा की कि आंध्रप्रदेश के वारंगल जिले के नरसम्पेट मंडल में किसानों के साथ 2 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी हुई है। स्थानीय अधिकारियों ने मोंसेंटो द्वारा प्रदत्त कपास के बीजों के खराब प्रदर्शन सम्बन्धी आंकड़ों में हेर फेर की थी । हमारी रिपोर्ट और जांच की मांग के बाद, रेकार्ड्स में हेराफेरी की जांच कराई गई और वारंगल के जेडीए को निलंबित कर दिया गया। राज्य सरकार ने स्वीकार किया कि वारंगल में मुआवजे की राशि 4.5 करोड़ रुपए होनी चाहिए। ग्रीनपीस द्वारा मुहैया कराए गए आंकड़ों की समीक्षा करने के बाद, जीईएसी ने बीटी कपास की तीन किस्मों एमईसीएच-12, एमईसीएच-162 और एमईसीएच-184 की आंध्रप्रदेश में बिक्री पर रोक लगा दी।

2004

बेयर ग्रीनपीस के सामने झुका: बेयर ने ग्रीनपीस इंडिया के सामने घुटने टेके और एलान किया कि जीई फसलों की उसकी सारी परियोजनाएं बंद कर दी गई हैं। यह स्वीकारोक्ति बेयर्स कारपोरेट कम्युनिकेशन के भारत में प्रमुख आलोक वी. प्रधान द्वारा भेजे गए पत्र में की गई। ग्रीनपीस द्वारा बेयर के मुंबई स्थित मुख्यालय के बाहर की गई कार्रवाइयों के बाद यह घोषणा हुई।

बेकार जहाज को कचरा माने जाने पर अंतरराष्ट्रीय समझौता: ग्रीनपीस जहाज़ों को नष्ट करने के शातिर उद्योग पर सख्त नियंत्रण करने के लिए प्रयासरत रहा है । ग्रीनपीस के प्रयासों के परिणामस्वरूप बेकार जहाजों को कचरा माने जाने का अंतरराष्ट्रीय समझौता संपन्न हुआ। समझौते में 163 देशों ने प्रतिबद्धता जताई कि वे जहाज़ों को नष्ट करने के काम में लगे मुख्य देशों - भारत, बंगलादेश और टर्की में निर्यात किए जाने से पूर्व जहाजों को दोषमुक्त करने की मांग बढ़ाएंगे। इससे विकसित देशों में जहाजों की बेहतर रिसाइक्लिंग पद्धति विकसित करने की नई मांग भी जोर पकड़ेगी।।

सुप्रीम कोर्ट की निगरानी समिति ने हिन्दुस्तान लीवर को दंडित किया: तीन साल तक ग्रीनपीस द्वारा आक्रामक अभियान चलाए जाने का परिणाम यह हुआ कि खतरनाक कचरों पर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी समिति (SCMK) ने हिन्दुस्तान लीवर पर 50 करोड़ रूपए का जुर्माना लगा दिया । सन 2001 हिन्दुस्तान लीवर के कोडाइकनाल में स्थित मर्करी थर्मामीटर फैक्ट्री प्लांट से होने वाले नुक्सान और खतरों का खुलासा ग्रीनपीस और दूसरे कई स्वयं सेवी संगठनों ने किया था जिसके चलते हिन्दुस्तान लीवर को उस फैक्ट्री को बंद करना पड़ा था । निगरानी समिति ने तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (TNPCB) से कहा कि वह हिन्दुस्तान लीवर से यह जुर्माना आवती बैंक गारंटी के रूप में वसूल करे ताकि फैक्ट्री बंद होने के बाद वातावरण को साफ़ करने का काम ठीक से संचालित किया जा सके और ‘प्रदूषक भुगतान करे’ सिद्धांत के तहत पर्यावरण के क्षतिग्रस्त और बर्बाद तत्वों को फिर से बहाल किया जा सके। हिन्दुस्तान लीवर से स्वास्थ्य क्लिनिक खोलने को भी कहा गया ताकि मर्करी जहर से प्रभावित लोगों को आवश्यक उपचार सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें।

2003

रेनबो युद्धक पोत की रिपोर्ट में कोडाइकनाल पर खास चर्चा: हिन्दुस्तान लीवर ने कोडाइकनाल स्थित अपने बंद पड़े मर्करी थर्मामीटर प्लांट से हुई क्षति की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया। कंपनी पर्यावरण नुक्सान और पूर्व कर्मचारियों तथा स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य को हुई क्षति की अनदेखी कर रही थी जबकि इंडियन पीपुल ट्रिब्युनल नामक संस्था द्वारा 2002 में जारी रिपोर्ट में इसकी पुष्टि की गयी थी। दिसंबर 2003 में ग्रीनपीस के रेनबो युद्धक पोत ने अपनी रिपोर्ट जारी की जिसमें हिन्दुस्तान लीवर द्वारा फैलाए गए मर्करी प्रदूषण का पूरा ब्यौरा है।

िन्दुस्तान लीवर से मर्करी कचरा अमरीका वापस भेजने को कहा गया: 2001 में ग्रीनपीस ने स्थानीय लोगों के साथ मिलकर कोडाइकनाल में हिन्दुस्तान लीवर द्वारा मर्करी कचरा डंप किए जाने का पर्दाफाश किया और यह खुलासा कंपनी के लिए एक बड़ी मुसीबत बन गया । मार्च 2003 में तमिलनाडु प्रदूषण बोर्ड ने हिन्दुस्तान लीवर को आदेश दिया कि वह स्क्रैप यार्ड और वनों में डंप किए गए मर्करीयुक्त ग्लास कचरे को एकत्र करे और रिसाइक्लिंग और निस्तारण के लिए वापस अमेरिका भेजे। इसके बाद कंपनी को मई 2003 में 289 टन कचरे को एकत्र करके और पैक करके तूतीकोरिन बंदरगाह से पेन्सिल्वेनिया स्थित रिसाइक्लिंग उपक्रम को वापस भेजना पड़ा।।

जीएम आलू जारी करने की डीबीटी योजना का पर्दाफाश: ग्रीनपीस कार्यकर्ताओं ने 2 सितंबर को बायोटेक्नोलोजी डिपार्टमेंट की सचिव डा. मंजू शर्मा के घर पर सौ किलो देसी कुफ्री किस्म के देसी आलू और ‘जीएम खाद्य कुपोषण का कोई हल नहीं’ के बैनर के साथ धमक करके उन्हें आश्चर्य में डाल दिया। डा. शर्मा ने आलू लेने से इनकार कर दिया लेकिन यह जरूर कहा कि जीएम आलू को स्वीकृति देने से पहले जैविक सुरक्षा मूल्यांकनों के लिए आवश्यक ‘निर्दिष्ट प्रक्रियाएं’ पूरी कर ली जाएंगीं।

आंध्र सरकार ने बीटी कपास की विफलता स्वीकारी: बीटी कपास के कुप्रभावों के खिलाफ महीनों अभियान चलाने के बाद आंध्रप्रदेश के कृषि मंत्री ने एक राष्ट्रीय टेलीविजन चैनल पर घोषणा की कि बीटी कपास ने प्रदेश में सकारात्मक और उत्साहवर्धक परिणाम नहीं दिए हैं। एक सप्ताह बाद राज्य सरकार ने बीटी किसानों को हर्जाना देने की घोषणा की।

2002

जीएम सरसो खारिज: नवंबर 2002 में बेयर कंपनी द्वारा विकसित ‘प्रो-एग्रो’ जीई सरसो को बाज़ार में उतारने की स्वीकृति मिलने वाली थी। ऐसे में ग्रीनपीस ने एक महीने तक सक्रिय अभियान चलाकर यह जागरूकता पैदा की कि इस पहली अनुवांशिक रूप से संवर्धित जीई खाद्य फसल के देश में कितने गंभीर खतरे सामने आने वाले हैं। 7 मार्च को जीईएसी की बैठक के रोज ग्रीनपीस के छह कार्यकर्ताओं ने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय भवन के सामने अपने को बांध दिया। इन बंधे हुए कार्यकर्ताओं ने मीडिया के माध्यम से मामले की गंभीरता पर रोशनी डाली जिससे जीईएसी प्रमुख पर जनता के पक्ष में निर्णय करने के लिए दबाव बन पाया। अनुवांशिक रूप से संवर्धित जीएम सरसो खारिज कर दिया गया और प्रो-एग्रो को खेतों में अपने परीक्षण दोहराने को कहा गया।

2001

हिन्दुस्तान लीवर के जहरीले डंपिंग का पर्दाफाश: ग्रीनपीस और एक स्थानीय पर्यावरण समूह – पलानी हिल्स कंजर्वेशन काउंसिल (PHCC) ने मर्करी युक्त ग्लास कचरे का पर्दाफाश किया जो कि एक स्थानीय स्क्रैप यार्ड में हिन्दुस्तान लीवर द्वारा डंप किया गया था। फिर स्थानीय लोगों ने भी फैक्ट्री साइट पर प्रदर्शन किया जिससे उसे बंद करना पड़ा, और तामिलनाडु प्रदूषण बोर्ड ने कंपनी को नोटिस जारी कर आदेश दिया कि वह उस साइट पर कोई गतिविधि करने से बाज आए।

जीएम घटकों का खुलासा: ग्रीनपीस ने प्रिंजिल्स पोटैटो चिप्स और आइसोमिल बेबीफूड में जीई घटकों की मिलावट का खुलासा किया और भारत के अनुवांशिक रूपस से संवर्धित खाद्य पदार्थों से मुक्त राष्ट्र के स्टेटस पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया।

बीटी कपास के व्यावसायिक वितरण पर रोक: ग्रीनपीस ने माइको-मोंसेंटो के बीटी कपास को मंजूरी देने के पहले जीईएसी द्वारा आयोजित ‘खुले संवाद’ में अपना पक्ष रखा। बीटी कपास का व्यावसायिक वितरण एक साल तक के लिए रोक दिया गया।