विलुप्त होने की कगार पर पहुंचे सुमात्राई बाघइंडोनेशिया में पाम ऑयल के लिए वर्षावनों की अंधाधुंध कटाई के कारण सुमात्राई बाघ विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुके हैं। तस्वीर- ©Paul Hilton / Greenpeace.

कुछ साल पहले जब भारत के जंगलों में सिर्फ 1411 बाघ शेष रह गए थे, तब मीडिया में यह खूब चर्चा का विषय बना था। कई नामचीन हस्तियों ने इस पर सवाल उठाये, कई योजनाएं भी बनाई गयीं और ये रिपोर्ट भी आई कि स्थिति में कुछ सुधार आया है और बाघों कि संख्या पहले से बढ़कर 1700 से ऊपर पहुंच गयी है।

खैर, ये  तो थी भारत की बात। बाघों के अस्तित्व पर हर जगह समान संकट मंडरा रहा है। लिहाज़ा इंडोनेशिया के वर्षा वनों में सुमात्राई प्रजाति के मात्र 400 बाघ शेष रह गए हैं। यही हालत वहां की स्थानीय प्रजाति के वनमानुषों की भी है। तमाम चिंताओं के बावजूद वहां सुधार के आसार नजर नहीं आते। बाघों और वन्यजीवों के अस्तित्व का संकट न बहुत नया है न इसके कारण ही बहुत अज्ञात हैं।

अधिकतर उद्योगों के विस्तार के लिए वनों का त्वरित विनाश ही उनके संकट का कारण बना है। बाघों को अपना अस्तित्व बचाने तथा प्रजनन के लिए विस्तृत वनों कि आवश्यकता होती है। एक तो सामान्य स्थिति में भी उनकी आबादी का घनत्व और जीवों की तुलना में कम होता है, ऊपर से उनके शावकों के जीवित रहने की संभावना भी और जीवों कि तुलना में कम होती है। ऐसे में जब वन नष्ट होते हैं या उनके टुकड़े कर दिए जाते हैं तो बचे हुए बाघों पर संकट और गहरा जाता है।

दुर्भाग्यवश, इंडोनेशिया में, जहां बाघों की दो प्रजातियां पहले ही विलुप्त हो चुकी हैं, बाघों के बचे हुए प्राकृतिक आवासों पर पॉम - आयल कंपनियों का प्रकोप निरंतर जारी  है। पर सवाल ये उठता है कि आखिर हम किसी दूसरे देश के बाघों कि चिंता क्यों करें? जब अपने देश में चिंता के विषय के लिए अनेक मुद्दे मौजूद हैं। दरअसल बाघों के संकट को सिर्फ उनका या किसी दूसरे देश की समस्या नहीं माना जा सकता।

इंडोनेशिया में वर्षावनों का कटान।इंडोनेशिया में पाम ऑयल के लिए वर्षावनों का अंधाधुंध विनाश किया जा रहा है। तस्वीर- © Kemal Jufri / Greenpeace

ये प्रतीक है उन भावी संकटों का जो मानव-जाति और उसके भविष्य पर मंड़रा रहे हैं। लिहाजा जलवायु परिवर्तन के कारण और इसका प्रतिफल अब कोई राज नहीं रहा जो हमें पता ना हो। वनों का विनाश जलवायु परिवर्तन का तीसरा सबसे बड़ा कारण है और इंडोनेशिया वनोन्मूलन संबंधित कार्बन उत्सर्जन में अव्वल है। अगर समय रहते उचित कदम न उठाये गए तो इसका प्रतिफल किसी राष्ट्र विशेष तक सीमित नहीं रहेगा। ब्रिटेन में 2006 में आई 'स्टर्न रिपोर्ट', में ये अनुमान लगाया गया था कि अगर वैश्विक तापमान में 5 से 6 डिग्री कि बढ़ोतरी का मतलब होगा पूरे विश्व के सकल घरेलू उत्पाद में 5 से 10 प्रतिशत की कमी।

इस रिपोर्ट में ये भी आगाह किया गया कि एक बार अगर जलवायु परिवर्तन का असर नज़र आने लगा तो फिर वहां से वापसी तकरीबन असंभव हो जाएगी। ऐसे ही एशियन डेवलपमेंट बैंक का अनुमान है कि दो अरब से ज्यादा एशियाई किसान पहले से जलवायु परिवर्तन के परिणाम झेल रहे हैं। इन किसानों कि फसलें हर साल आने वाली बाढ़, सूखा और वर्षा में अनिश्चितता का शिकार हो रही हैं। 

अब ये भी कोई राज नहीं रहा की वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी को 2 डिग्री तक सीमित रखने की कोशिशों पर अधिकतर देश पीछे ही चल रहे हैं। पिछले दिनों वर्सावा में हुए CoP 19 में अधिकतर देश अपने पहले से तय किये गए लक्ष्यों से पीछे हटते दिखे। ऐसे में भविष्य में स्थिति बेहतर होने कि सम्भावना कम ही है। 

वास्तव में ऐसा भी नहीं है कि इंडोनेशिया में वनों के विनाश में हमारा कोई योगदान न हो। जिस ‘पाम ऑयल’ उद्योग के विस्तार के लिए वहां वनों का सबसे ज्यादा विनाश हुआ है उसका सबसे बड़ा आयातक भारत ही है। रूचि सोया, अदानी-विल्मर, कारगिल और वी वी एफ समेत कई अन्य कम्पनियां हर साल ‘पाम आयल’ का आयात करती हैं। जबकि ब्रिटानिया, पारले, गोदरेज, आई टी सी जैसी कंपनियां अपने उत्पादों में इसका इस्तेमाल करती हैं।

अधिकतर मामलों में ये जानने की  कोशिश भी नहीं की जाती कि इस आयातित ‘पाम आयल’ का सीधी संबंध इंडोनेशियाई वर्षा वनों के विनाश से है। हालांकि गत दिसंबर में दुनिया कि सबसे बड़ी ‘पाम ऑयल’ कंपनी विल्मर ने अपनी घोषित नीतियों में ये वायदा किया गया है कि ‘पाम ऑयल’ से संबंधित वनोन्मूलन को पूर्णतया रोका जायेगा। इससे पहले नेस्ले और यूनिलीवर जैसी कम्पनियां भी ऐसी नीतियां घोषित कर चुकी हैं।  ऐसे में भारतीय कंपनियों का ये उत्तरदायित्व है कि जो ‘पाम ऑयल’ वो आयात करती हैं उसके स्रोत की सही जानकारी रखें और ये निश्चित करें कि इसके लिए वनों का अंधाधुंध विनाश न हो रहा हो।

अब समय आ गया है कि हम सबसे बड़े आयातक के तौर पर चेत जाएं और बाज़ार को बदलने के लिए हर सम्भव कदम उठायें। ये हमारा उत्तरदायित्व भी है और जलवायु परिवर्तन को रोकने का एक मौका भी।  पिछले साल की घटनाओं पर ध्यान दें, तो उत्तराखंड की त्रासदी और उसके बाद  ‘फाइलिन’ आने वाले समय के बारे में खासा इशारा करते हैं। हम अभी भी कह सकते हैं इनके कारणों के पीछे जो प्रमाण हैं वो काफी नहीं हैं और शायद हमें पर्याप्त प्रमाण मिलेंगे भी नहीं। कम से कम तब तक जब तक बाघों की कई और प्रजातियां नष्ट नहीं हो चुकी होंगी।

यह  ब्लॉग ग्रीनपीस के 'फॉरेस्ट कैंपेनर' अविमुक्तेश भारद्वाज द्वारा लिखा गया है।