05 जून 2014

अमीलिया गांव का एक ग्रामीण। तस्वीर @ उदित कुलश्रेष्ठ/ ग्रीनपीस इंडिया।

धूल-धरसित कस्बे वैढ़न के शोर-शराबे से कुछ ही किलोमीटर दूर महान जंगल एक अलग किस्म की शांति में लिपटा हुआ लगा। यहां कानों में गाड़ियों का शोर नहीं सुनाई पड़ता, सुनाई पड़ती है तो चिड़ियों और झींगुरों की आवाज़ें जो कानों में मधुर स्वर पैदा करती हैं। सिर के ऊपर तेज चमकती धूप पड़ती है तो तुरंत पेड़ों की छांव में सिर छुपाने की जगह भी मिल जाती है। चारों तरफ नज़र आने वाली हरियाली और ताज़ी हवा शरीर को थकने नहीं देती।

आज विश्व पर्यावरण दिवस है और इस दिन ऐसे खूबसूरत जंगल में होना वाकई बहुत रोमांचक अनुभव है। पर्यावरण दिवस के दिन लोग ज्यादातर प्रदूषण और उससे जुड़ी समस्याओं के बारे में बात करते हैं, मगर फिर भी मैं प्रदूषण, फैक्ट्रियों उनके हानिकारक असर, नीतियों और जलवायु परिवर्तन के बारे में बात नहीं करना चाहती।  

05 जून 2014

अमीलिया गांव की एक महिला। तस्वीर @ उदित कुलश्रेष्ठ/ ग्रीनपीस इंडिया।

महान जंगल की विशालता और नीरवता मन को बहुत सुकून देती है। 1200 एकड़ में फैला यह जंगल मध्य भारत के बचे-खुचे सघन वनों में से एक होने के साथ ही साथ एशिया का सबसे बड़ा और सबसे पुराना साल का जंगल भी है। ऐसा माना जा रहा है कि मध्य प्रदेश में तेजी से जंगल खत्म हो रहे हैं और महान भी तबाही की कगार पर खड़ा है।

इस जंगल में तेंदुआ, लकड़बग्घा जैसे जानवर रहते हैं, कई लुप्त प्राय पक्षी और 164 पौधों की प्रजाति पाई जाती है। यह जंगल इसके आस-पास रहने वाले लोगों के जीवन के केंद्रबिंदु की तरह है। फिर चाहे शादी-त्यौहार हो या कोई अन्य रीति-रिवाज सभी चीजें जंगल के इर्द-गिर्द घूमती हैं। ग्रामीण जंगल से तेंदु की पत्तियां इकट्ठा करते हैं और इन्हें सुखाकर बेचा जाता है जिससे बीड़ी बनाई जाती है। तेंदु फल स्वाद में मीठा होता है और जंगल में खूब मिलता है।

महुआ के फूलों का इस्तेमाल लड्डू, बिस्कुट और शराब बनाने में किया जाता है। स्थानीय ग्रामीण जंगल से मिलने वाले हर उत्पाद का बखूबी इस्तेमाल करते हैं। यहां के लोगों के जीवन में चीजों की अधिकता नहीं है और इसलिए जंगल से जो भी मिलता है उसे बर्बाद नहीं किया जा सकता। ये अपनी सब्जियां खुद उगाते हैं, अपना अनाज खुद पैदा करते हैं, पशु पालते हैं और महुआ बीनते हैं। इन लोगों का जंगल से इतना गहरा रिश्ता है कि जंगल के बिना जीवन संभव ही नहीं और यही वह बुनियाद है जिसने यहां प्रस्तावित कोयला खदान के खिलाफ आदिवासियों का एक आंदोलन खड़ा कर दिया है। जिससे पीछे हटने की गुंजाइश ही नहीं है।   

05 जून 2014

अमीलिया गांव के एक और तस्वीर। तस्वीर @ उदित कुलश्रेष्ठ / ग्रीनपीस इंडिया।

इस क्षेत्र में बहुत सारे गांव और टोले आते हैं। मगर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन किस टोले या गांव से आता है। मैंने बार-बार कई पुरुषों और महिलाओं को यह कहते सुना कि, “हमने तो मुआवज़े के बारे में कभी सोचा भी नहीं क्योंकि हमें सिर्फ हमारा जंगल और हमारी ज़मीन चाहिए।”  गांव का ही अन्य व्यक्ति कहता है, “मुआवजे से तो सिर्फ कुछ समय के लिए फायदा मिलेगा लेकिन भविष्य की पीढ़ी से उनकी रोज़ी-रोटी और जीवन जीने का तरीका छिन जाएगा।”

महान जंगल में प्रस्तावित कोयला खदान का दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। यदि यह खदान शुरु हुई तो इससे क्षेत्र में दूसरी खनन परियोजनाओं का रास्ता आसान हो जाएगा। जिससे यहां रहने वाले मनुष्यों और पशुओं दोनों को दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा क्योंकि यह हाथीयों का (कॉरिडोर) गलियारा है। साथ ही रिहंद का जलग्रहण क्षेत्र होने के कारण महान जंगल मिट्टी को उपजाऊ बनाए रखता है और मिट्टी का कटाव रोकता है।

05 जून 2014

महुआ इकट्ठा करता एक बच्चा। तस्वीर @ अविनाश कुमार चंचल/ ग्रीनपीस इंडिया।

अब सवाल उठता है कि महान में जो हो रहा है हमें उससे क्या फर्क पड़ता है? महान में प्रस्तावित खनन परियोजना सूचक है कि विकास के नाम पर किस तरह हमारे जंगलों को खत्म किया जा रहा है। आरटीआई द्वारा इकट्ठा किए गए आंकड़ों के मुताबिक भारत में रोज 135 हेक्टेयर जंगल खत्म हो रहे हैं। एक दूसरी रिपोर्ट बताती है यूपीए काल में सरकार ने 702,000 हेक्टेयर जंगल कंपनियों को तबाही के लिए दे दिए। यह भू-भाग दिल्ली जैसे शहर का पांच गुना है।

ऐसा नहीं हो सकता कि देश के एक कोने में जो हो रहा है, उसका असर देश के दूसरे कोने में नहीं होगा। दरअसल सच यह है कि बर्बाद होते पर्यावरण का असर हम सब पर पड़ रहा है और अगर हम अपना भविष्य सुनहरा देखना चाहते हैं तो हमें आज पर्यावरण दिवस के दिन से ही बदलाव लाना होगा। आप जहां भी हैं, तबाही की तरफ बढ़ते महान जंगल को बचाने की कोशिश कर सकते हैं। अभी साइनअप करें और ‘महान बचाओ’ आंदोलन के साथ जुड़ें। आज आपके द्वारा उठाया गया एक कदम भविष्य की बढ़ते हमारे कदमों को सुरक्षित कर सकता है।

महान से श्रीदेवी पद्मनाभन। मूल आलेख अंग्रेजी में लिखा गया है।