Ramprasad wegaएस्सार समेत तमाम कंपनियों के खिलाफ बढ़ता जा रहा प्रतिरोध

दरअसल पूरे इलाके में कई कोयला खदान प्रस्तावित हैं। इन कोयले के खदानों से करीब लाखों लोगों की आबादी विस्थापित होने को मजबूर हो जाएगी। अकेले महान जंगल में प्रस्तावित  महान कोल ब्लॉक (एस्सार व हिंडाल्को का संयुक्त उपक्रम) से ही 54 गांवों के 85 हजार लोग विस्थापित होंगे। अपने जंगल को बचाने के लिए आसपास के गांव वाले संगठित होकर संघर्ष भी कर रहे हैं।

भूमि अधिग्रहण और कोयला खदान की खबर मिलने के बाद अब चार-पांच सालों में पिढ़रवा गांव की फिजा भी बदल रही है। लोग अपने जंगल-जमीन को बचाने के लिए संगठित भी हो रहे हैं। लल्ला सिंह खैरवार थोड़ी ऊंची आवाज में कहते हैं, “अपना जमीन-जंगल ऐसे कैसे दे देंगे। महुआ, तेंदू, पत्ता से लेकर जमीन तक सबकुछ इसी जंगल से आता है। न डॉक्टर के पास जाने की जरुरत होती है , न ही कभी रोजी-रोटी के लिए गांव से बाहर पलायन करने की जरुरत हुई”।

लल्ला के हां में हां मिलाते हुए उम्मीद से भरे रामप्रसाद खैरवार स्थानीय भाषा में बोलते हैं, “पूरा पिढरवा को एकता लाना होगा। अगर खदान रोकल चाहत हई तो रुक जाई। खेती-किसानी करवा, महतारी (जमीन-जंगल) के बेचे के न चाही, जंगल बेच दी तो कै दी खरची-हमार हरेक चीज बा जंगल से-जंगल हमार जीवन बा” (पूरे पिढरवा को एक होना पड़ेगा। अगर हम खदान रोकना चाहेंगे तो रुक जायेगी। हम लोग खेती-किसानी करेंगे, अपनी मातृभूमि को नहीं बेचेंगे। जंगल बेच देंगे तो कौन हमारे घर का खर्चा देगा। हमारा सबकुछ जंगल से ही है-जंगल हमारा जीवन है।)

पास खड़े दूसरे लोग भी एक होकर जंगल-जमीन बचाने के लिए संघर्ष करने की बात कहते हैं। खेलावन खैरवार के शब्दों में, “जंगल में घुसे नहीं देंगे। जिन्दगी हमारा, नाना-पुरखा का सबका यहीं कटा। कमावत हैं, खात हैं। सरकार तो कुछ देती नहीं है उल्टे जगह-जमीन छिन कर विस्थापित करने पर आमदा है।”

गांव के युवाओं ने खोली विकास की पोल

कंपनियों द्वारा गांव वालों को विकास के सब्ज़बाग दिखाने पर 22 साल के राजेश सिंह गोंड सही सवाल उठाते हैं। “विकास कहां होगा, कंपनी आएगी तो जंगल कटने से वायू प्रदुषण होगा, बम ब्लास्टिंग से जीना मुहाल होगा और आत्यचार बढ़ जाएगा।” दसवीं तक की पढ़ाई कर चुके राजेश संघर्ष करने और जंगल-जमीन नहीं देने की बात करते हैं। 20 वर्ष के दहलीज पर खड़े गुलाब सिंह खैरवार आजतक शहर के नाम पर सिर्फ एक बार जबलपुर गए हैं-डॉक्टरी के काम से। “शहर में बहुत परेशानी है। यहां अपनी स्वतंत्रता है जीने की अपनी आजादी। जंगल से महुआ,तेंदु और जमीन से गेंहू-मकई और जब कभी जरुरत पड़ने पर जंगली लकड़ी बेच कुछ नकद भी कमा लेते हैं”। गुलाब बड़े ही आसानी से अपनी जिन्दगी की अर्थव्यवस्था को समझा देते हैं।

सारी समस्याओं को जानने के बाद भी मैं सवाल करता हूं,  “आपकी मांग क्या है”? छोटे सिंह गोंड थोड़ा रुकते हैं, फिर बेहद संजीदा आवाज में कहते हैं- “सबसे पहले घर बनाने का प्रतिबंध हटे, इंदिरा आवास जैसी सरकारी सुविधाओं का लाभ मिले। जंगल पर वन अधिकार दिया जाय।”  विकास करना ही है तो सरकार करे न कि कंपनी। नहीं तो आंदोलन करेंगे। कोर्ट से लेकर सरकार तक हर दरवाजे पर दस्तक देंगे”।

फिलहाल पिढरवा गांव के आदिवासियों की आवाज लोकतंत्र के खंभों के नीचे कराह रही है।

अविनाश कुमार चंचल पिछले एक साल से मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले में रहकर वहां बड़े कॉर्पोरेट घरानों के खिलाफ चल रही ज़मीनी लड़ाई की खबरों को हम तक पहुंचा रहे हैं। अविनाश फिलहाल ग्रीनपीस के साथ जुड़े हैं। 


आलेख  beyondheadlines.in में प्रकाशित हो चुका है।