सुबह के चार बज रहे हैं। महुआ का महीना है। जब जंगलों में रात-दिन महुआ बीनने (चुनने) वालों का मेला लगा रहता है। सिंगरौली के महान जंगल में भी आसपास के जंगलवासी अपने पूरे परिवार के साथ महुआ बीन रहे हैं। बच्चे, बूढ़े और जवान इस काम में परिवार के सभी सदस्य शामिल हैं। जंगल में चारों तरफ महुए की महक बिखरी हुई है। हालांकि इस बार महुआ कम गिरा है। ऐसा लगता है कि कंपनी के आने की खबर से महुए के ये पेड़ भी निराश हैं। आदमी और पेड़ के बीच के इस खूबसूरत संबंध को न तो कंपनी के लोग समझेंगे और न ही कंपनी को जंगल सौंपने वाली सरकार। दरअसल महान जंगल को सरकार ने महान कोल लिमिटेड (एस्सार व हिंडाल्को का संयुक्त उपक्रम) को कोयला खदान के लिए दे दिया है। महान जंगल जिसमें करीब 5 लाख पेड़, 164 प्रजातियां और 54 गांवों के लोगों की जीविका निर्भर है। पास ही एक पेड़ के नीचे एक ढिबरी की रौशनी में कुछ गांव वाले गीत गा रहे हैं। गीत और महुआ की महक ने मिलकर माहौल को मादक बना दिया है-

28 अप्रैल 2014 महुआ इकट्ठा करते ग्रामीण

महुआ बीने दोहर होये जाय, परदेशी के बोली नोहर होये जाय। गीत में थोड़ी सी खुशी है, थोड़ा सा गम। खुशी इस बात की कि ढेर सारा महुआ इकट्ठा हो गया है। दुख इस बात का कि महुआ बीनते-बीनते जिस परदेशी से लगाव हो गया था वो अब बिछड़ जायेगा।

 

28 अप्रैल 2014 महुआ इकट्ठा करते ग्रामीण

आसपास के कई गांव के लोग महुआ बीनने जंगल पहुंचते हैं। इस काम में महिला ,पुरुष, बच्चे बूढ़े और जवान सभी शामिल होते हैं।

 

28 अप्रैल 2014 महुआ इकट्ठा करते ग्रामीण

अगर कंपनी जंगल में कोयला खदान खोलने में सफल हो जाती है तो आने वाले सालों में सबकुछ मटियामेट हो जायेगा।

 

28 अप्रैल 2014 महुआ इकट्ठा करते ग्रामीण

महुआ, डोर, तेंदू, साल के पत्तों का हरापन और भावुक रिश्तों को समेट गाए जाने वाले गीत- सबकुछ एक गंदे औद्योगिक कचरे, कोयले से भरी धूल में दब कर रह जायेगा। तमाम दूसरी चीजों के अलावा महुआ के फल (डोरी) से तेल भी निकलता है।

 

28 अप्रैल 2014 महुआ इकट्ठा करते ग्रामीण

ये तेल सिर्फ खाना पकाने के काम में नहीं आता बल्कि ठंड में जब शहरी लोग क्रीम लगाते हैं तो गांव के लोग पैर फटने से लेकर चेहरे तक डोरी का तेल लगाकर अपनी त्वचा मुलायम रखते हैं।

 

28 अप्रैल 2014 महुआ इकट्ठा करते ग्रामीण

महुआ इन लोगों के जीवन में रचा-बसा है। महुआ-जंगल-जंगलवासी – एक दूसरे पर निर्भर हैं।

 

28 अप्रैल 2014 महुआ इकट्ठा करते ग्रामीण

इस काम में महिला ,पुरुष, बच्चे बूढ़े और जवान सभी शामिल होते हैं।

 

28 अप्रैल 2014 महुआ इकट्ठा करते ग्रामीण

महुआ और जंगल के आसपास ही जंगलवासियों की पूरी संस्कृति विकसित हुई है, परंपरागत जीवनशैली का विकास हुआ है। ये बड़ा सवाल है अगर ये जंगल ही नहीं रहेगा तो इन लोगो का क्या होगा?