आज सौर ऊर्जा की रोशनी में पढ़ने वाले ये बच्चे, कल देश का भविष्य बनेंगे

धरनई एक ऐसा गांव जिसने 30 साल बाद बिजली की चमक देखी है। वैसे तो यह गांव सड़क और रेलवे लाइन से जुड़ा हुआ है मगर बिजली जैसी मूलभूत सुविधा आजतक इस गांव में नहीं पहुंची है।

मगर अब बिजली की चमक से धरनईवासियों के चेहरे भी चमकने लगे है। अब अंधेरा होने पर महिलाओं को घर से बाहर जाने में पहले की तरह मुश्किलें नहीं होतीं और खाना बनाते समय पहले की तरह अंधेरे में माथापच्ची नहीं करनी पड़ती। अंधेरा होने के बाद बच्चों को पढ़ने के लिए लैंप या ढिबरी की रोशनी में जद्दोजहद नहीं करनी पड़ती और किसानों को खेतों में सिंचाई सुविधा मिलने से पहले की तरह डीजल की जरूरत नहीं पड़ती।

बिहार के जहानाबाद जिले के धरनई गांव के रहने वाले गौतम कुमार पढ़ाई कर दिल्ली से लौटे हैं। गौतम का कहना है, ‘पहले जहां गांव आने के बाद शाम को सिर्फ एक या दो घंटे पढ़ पाते थे वहीं अब देर तक पढ़ सकते हैं। अब बिजली के आने से लैपटॉप और इंटरनेट का इस्तेमाल भी पहले से ज्यादा आसान हो गया है।’

बिजली के वापस आने से गांव सरकारी स्कूलों में तैनात शिक्षकों और बच्चों के मन में भी नई उम्मीद जगी है। स्कूल के शिक्षक गोपाल कहते हैं, ‘साल 2008-09 में स्कूल को 6 कंप्यूटर दिए गए थे लेकिन बिजली नहीं रहने के कारण उन्हें वापस ले लिया गया।’ अब गोपाल को उम्मीद है कि यह कंप्यूटर उन्हें वापस मिल पाएंगे और बच्चे इनका उपयोग कर पाएंगे।

बिजली की चमक किसनों के चेहरों पर और खेतों की हरियाली पर भी साफ दिखाई पड़ रही है।

गांव के किसानों को आशा है कि बिजली के आने से खेती की लागत घटेगी यानी सिंचाई के लिए डीजल पर निर्भरता घटेगी और फसल का अच्छा दाम मिल सकेगा। जिससे एकबार फिर जीवन में खुशहाल दिन लौटेंगे।  

धरनई गांव के सरपंच कृष्णचंद यादव बताते हैं, ‘सन् 1968 में बिजली आई थी मगर दस बरस के बाद चली हो गई। जिसका कारण यह था कि उस साल फसल अच्छी नहीं हुई, किसान बिजली का बिल नहीं चुका पाए। उसके बाद एक बार ट्रांसफार्मर जला तो दोबारा मिला नहीं।’

मगर पर्यावरण के लिए काम करने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था के प्रयासों से गांव में फिर से बिजली पहुंची है। ग्रीनपीस ने धरनई गांव में सौर ऊर्जा चालित माइकोग्रिड की स्थापना कर सौ किलोवाट बिजली की उत्पादन कर रही है। ग्रीनपीस इंडिया के अक्षय ऊर्जा प्रमुख रमापति कुमार बताते हैं कि भारत में माइक्रोग्रिड के जरिए 24 घंटे बिजली पैदा करने का यह पहला सफल प्रयास है।

रमापति कुमार का कहना है बिजली आने से सबसे ज्यादा असर महिलाओं की सुरक्षा, बच्चों की शिक्षा और स्थानीय व्यवसाय पर पड़ा है। सौर ऊर्जा से मिलने वाली यह बिजली धीरे-धीरे  धरनई गांव को रोशन कर रही है जो पिछले 30 साल से अंधेरे में जी रहा था।

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